वो मेरा था मगर मेरा कहां था

उफ़क़ को देखकर ऐसा गुमां था
ज़मीं की दोस्ती में आसमां था

कोई उलझन नहीं थी इस से बढ़कर
वो मेरा था मगर मेरा कहां था

हुनर ही था, इसे क्या और कहिये
बड़ी तहज़ीब से नामेहरबां था

ज़मीर आया मेरी आँखों के आगे
वगरना मै भी उसका राज़दां था

यकीं तो था मुझे पर कुछ कमी थी
अजब सा फ़ासिला इक दर्मियां था

ख़ता थी, हाँ ख़ता ही थी वो मेरी
मुझे था प्यार और बेइन्तिहां था

ज़हन अहमक़ ज़बां नादां थी उसकी
मगर दिल से बुरा ‘रोहित’ कहां था

रोहित जैन
07-03-2011

उफ़क़ – Horizon
नामेहरबां – Rude
वगरना – Otherwise
अहमक़ – Foolish/Immature

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शायद

दिल मेरा बेज़ुबान है शायद
फ़ासिला दर्मियान है शायद

उसने बोला है भूल जाऊं उसे
काम इतना आसान है शायद

ड़ूबते दिल की शाम ऐसी है
जल रहा आसमान है शायद

7-2-2011

हमपे सारे सितम नहीं गुज़रे
वो ख़ुदा मेहरबान है शायद

फ़क़त उनकी ही चाह है दिल को
कोई बच्चा नादान है शायद

लब सिले हैं तो कौन रोता है
ज़ख़्म की भी ज़बान है शायद

हिज्र की बात पे वो चुप से हैं
इक बड़ी दास्तान है शायद

मै बुरा हूं ये तेरे लब्ज़ नहीं
दुश्मनों का बयान है शायद

इश्क़ में क्यों मुझे ये लगता है
ये कोई इम्तिहान है शायद

ज़िंदगी रुक गई है अब ‘रोहित’
उम्र भर की थकान है शायद

रोहित जैन
9-2-2011

Published in: on फ़रवरी 9, 2011 at 7:26 पूर्वाह्न  Comments (3)  
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एक कोशिश

कुछ ख़याल आ रहे थे ज़हन में तो लिखने की कोशिश की है और साथ में एक कोशिश और की है, रदीफ़ में अपना नाम लगाने की…
टिप्पणी का मुन्तज़िर रहूंगा…

सब तो तेरे पास है रोहित
क्या है जिसकी आस है रोहित

एक ख़ुदा ही है जो सच है
बाकी सब बकवास है रोहित

जैसे जीता है तू जी ले
क्या लिखना इतिहास है रोहित

तू भी हड़्ड़ी पसली चमड़ी
कौनसा तू कोई ख़ास है रोहित

एक साथ मुस्कान-ओ-आँसू?
दुनिया का एहसास है रोहित

क्या खुश है तू इन्सां बन के
ये तेरा बनवास है रोहित

चाहे फिर घुटना मरना हो
जीवन सब को रास है रोहित

अस्ल में चाहे दो कौड़ी हो
दिखता सब अल्मास है रोहित

धरती अम्बर एक करेगा
ये कैसा विश्वास है रोहित

बड़ा खा रहा है छोटे को
ये जीने की प्यास है रोहित

वक़्त पड़े छुप जाएगा तू
काहे का बिन्दास है रोहित

जीना है जैसे दिन निकलें
जीना एक सिपास है रोहित

और न शायर का मुँह खुलवा
दिल में बहुत भड़ास है रोहित

रोहित जैन
01-09-2010

अल्मास – Diamond
सिपास – Obligation

Published in: on सितम्बर 2, 2010 at 7:32 पूर्वाह्न  Comments (11)  
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इश्क़ करो और गिने जाओ ख़राब में

ना जाने ये लिखा हुआ है किस किताब में
के इश्क़ करो और गिने जाओ ख़राब में

काँटों ने जब लहू से किया और सुर्ख़ उसे
तब जाके कहीं रंग आया है गुलाब में

चाहा तो था दिल को मिले सुकूं जवाब से
कितने सवाल आते हैं उनके जवाब में

मुझको तो शायद कश्तियां थीं ढ़ूंढ़नी
मै ही यां ड़ूबा हुआ हूं इक सैलाब में

है होश में वही जो मिला आप से हुज़ूर
बाकी सभी भटकते हैं अब तक सराब में

इक यां ही तो मुझे नसीब दीद-ए-यार है
बस एक यही बात तो अच्छी है ख़्वाब में

तूने नज़र उठाई ही क्यों मैक़दे की ओर
कोई मज़ा बाकी ही न रहा शराब में

न जाने तुझे बात याद कौन कौन है
मैने तो इश्क़ में रखा न कुछ हिसाब में

‘रोहित’ को भी ‘ग़ालिब’ की तरह जागना होगा
आने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में

रोहित जैन
01-09-2010

दिल रहता है भरा भरा

गुलज़ार साहब की ग़ज़ल से काफ़िया चुराने की गुस्ताखी कर रहा हूँ, उम्मीद है आप इसके लिये मुझे माफ़ करेंगे…

गलती ही की जो सब बोला खरा खरा
क्या बोलूं अब मै हूँ कितना ड़रा ड़रा

कुछ तो तबियत यारों अपनी नाज़ुक है
और जिगर का ज़ख़्म भी तो है हरा हरा

जब से तूने खाली खाली बातें कीं
तब से मेरा दिल रहता है भरा भरा

चेहरे का बिस्तर भी सिलवट सिलवट है
ज़ीस्त का दफ़्तर भी बिखरा है ज़रा ज़रा

इश्क़, रफ़ाक़त, रिश्ते, पैसा, जागीरें
सब रह जाएगा ऐसे ही धरा धरा

ऐसा क्या बोला ‘रोहित’ इस दुनिया से
जो इन की नज़रों में तू है मरा मरा

रोहित जैन
31-08-2010

सोच के देखो…

सोच के देखो प्यार में हम दोनों पूरे दीवाने हों
सोच के देखो दुनियाभर में अपने ही अफ़साने हों

सोच के देखो जुनूं इश्क़ के हम दोनों पर तारी हों
सोच के देखो दिन हैरां हों और रातें भी भारी हों

सोच के देखो दिल में अपने सचमुच के काशाने हों
सोच के देखो दो आँखों में सचमुच के मैख़ाने हों

सोच के देखो इश्क़ हक़ीक़त बाकी सब कुछ माया हो
सोच के देखो इश्क़ इश्क़ ही इस दुनिया पर छाया हो

सोच के देखो दिल की बातें सारी तुम्हे बताईं हों
सोच के देखो कुछ बातें हमने तुमसे भी छुपाई हों

सोच के देखो होठों पर मुस्कानें भरने वाली हों
सोच के देखो आँखों से दो बूँदें गिरने वाली हों

सोच के देखो चाँद सितारे तुम्हे देखकर चलते हों
सोच के देखो फूल बहारों के भी तुमसे जलते हों

सोच के देखो अंधियारों के बीच कहीं उजियारे हों
सोच के देखो ग़म के लम्हे जीवन में बंजारे हों

सोच के देखो चाँद पे सुंदर सुंदर परियां रहतीं हों
सोच के देखो इन्द्रधनुष में सतरंगी नदियां बहतीं हों

सोच के देखो ये बादल सच में ज़ुल्फ़ों के साए हों
सोच के देखो ये साये सारी दुनिया पर छाए हों

सोच के देखो सुर्ख़ लबों से फूल गुलाब के गिरते हों
सोच के देखो आँखों से सचमुच के मोती झरते हों

सोच के देखो तारे थक कर सुबह कहीं सो जाते हों
सोच के देखो चकोर चाँद से मिलने उड़कर जाते हों

सोच के देखो गंगा में पाप सभी धुल जाते हों
सोच के देखो वक़्त के सागर में सब ग़म घुल जाते हों

सोच के देखो जो सोचा वो सब हक़ीक़त हो जायें
सोच के देखो सब लम्हे ख़्वाबों से खूबसूरत हो जायें

रोहित जैन
22-6-2010