परिन्दे

कैसी उड़ान में हैं ये ख़्वाबों के परिन्दे
ख़्वाहिश के आसमां में अज़ाबों के परिन्दे

शाखों पे मेरे दर्द की बैठे हैं सब के सब
उड़ के जो आए थे तेरी यादों के परिन्दे

कब तक रखेंगे क़ैद इन्हें आप जिस्म में
छूटेंगे किसी रोज़ तो साँसों के परिन्दे

छुप जाएगी वो रोशनी, हिल जाएगा वो अर्श
ग़मेदिल से रिहा होंगे जो आहों के परिन्दे

टुकड़े बिखेरते चले हम दिल के हर तरफ़
हमको दुआएं देते हैं राहों के परिन्दे

‘रोहित’ किसी के दिल को पढ़ेगा तो किस तरह
चेहरे को ढ़क रहे हैं नक़ाबों के परिन्दे

रोहित जैन
01-04-2011

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Published in: on अप्रैल 4, 2011 at 5:33 अपराह्न  Comments (5)  
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वो मेरा था मगर मेरा कहां था

उफ़क़ को देखकर ऐसा गुमां था
ज़मीं की दोस्ती में आसमां था

कोई उलझन नहीं थी इस से बढ़कर
वो मेरा था मगर मेरा कहां था

हुनर ही था, इसे क्या और कहिये
बड़ी तहज़ीब से नामेहरबां था

ज़मीर आया मेरी आँखों के आगे
वगरना मै भी उसका राज़दां था

यकीं तो था मुझे पर कुछ कमी थी
अजब सा फ़ासिला इक दर्मियां था

ख़ता थी, हाँ ख़ता ही थी वो मेरी
मुझे था प्यार और बेइन्तिहां था

ज़हन अहमक़ ज़बां नादां थी उसकी
मगर दिल से बुरा ‘रोहित’ कहां था

रोहित जैन
07-03-2011

उफ़क़ – Horizon
नामेहरबां – Rude
वगरना – Otherwise
अहमक़ – Foolish/Immature

रुसवाई

हर इक बाज़ी हार चुके हैं, खेल में हर इक मात हुई
दिन के उजियारे दुनिया में लेकिन दिल में रात हुई

जिसको हमने प्यार किया उसने ही दुश्मन मान लिया
कैसे सिफ़र हुए हैं अब हम, क्या अपनी औक़ात हुई

यूँ तो कल ही बिछड़े हैं हम फिर क्यों ऐसा लगता है
कितना अरसा बीत चुका है के जब तुमसे बात हुई

ग़म के क़ाज़ी ने पूछा तो हमने कहा क़बूल क़बूल
दिल के टुकड़ों की दावत है, अश्क़ों की बारात हुई

हमने सोचा कुछ तो मुक़द्दर बदलेगा बरसातों में
ऐसी किस्मत पाई है के पत्थर की बरसात हुई

अहलेदुनिया की ठोकर तो कितनी खाईं ‘रोहित’ ने
आपने भी जब ठोकर मारी, रुसवा अपनी ज़ात हुई

रोहित जैन
24-02-2011

Published in: on मार्च 3, 2011 at 8:33 पूर्वाह्न  Comments (3)  
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रिश्ता

कैसे रिश्ते खत्म किये जाते हैं मेरे यार सिखा दे
कैसे भूल गया तू मेरा प्यार सिखा दे
मै तो अब तक भूल नहीं पाता हूँ तुझको
अपने ख़्वाबों, यादों में पाता हूँ तुझको
तेरे जैसा मेरा कोई और नहीं था
दूर भी था मुझसे और मुझसे दूर नहीं था
कैसे दिल की बातें सब कर लेते थे हम
इक दूजे को यार सलाहें देते थे हम
सारे ड़र, सारी खुशियां और सारे ही ग़म
कैसे बांट लिया करते थे यार मेरे हम
औरों से भी पूछने जो होते थे हमको
इक दूजे से पूछ लिया करते थे उनको
कैसे हल हो जाते थे सवाल वो सारे
कैसे भूल गया तू माह-ओ-साल वो सारे
पहले जब इक दिन भी बात नहीं होती थी
चैन का दिन और चैन की रात नहीं होती थी
रातें जगकर, सब बातों से वक़्त बचाकर
चैन मिला करता था दिल का हाल सुनाकर
छोटी छोटी बातें भी कहनी होती थीं
इक दूजे के ड़ांटें भी सहनी होती थीं
कितना फ़ख़्र किया करते थे इक दूजे पर
और ऐतबार किया करते थे इक दूजे पर
दुनिया को मिसाल देते थे अपनी यारी की
सबसे कहते थे दूजे की दिलदारी की
दिल का रिश्ता था लोगों की समझ से आगे
इख़लास का रिश्ता था दुनिया की पहुंच से आगे

जाने किस की नज़र लगी है इस रिश्ते को?

रोहित जैन
11-02-2011

शायद

दिल मेरा बेज़ुबान है शायद
फ़ासिला दर्मियान है शायद

उसने बोला है भूल जाऊं उसे
काम इतना आसान है शायद

ड़ूबते दिल की शाम ऐसी है
जल रहा आसमान है शायद

7-2-2011

हमपे सारे सितम नहीं गुज़रे
वो ख़ुदा मेहरबान है शायद

फ़क़त उनकी ही चाह है दिल को
कोई बच्चा नादान है शायद

लब सिले हैं तो कौन रोता है
ज़ख़्म की भी ज़बान है शायद

हिज्र की बात पे वो चुप से हैं
इक बड़ी दास्तान है शायद

मै बुरा हूं ये तेरे लब्ज़ नहीं
दुश्मनों का बयान है शायद

इश्क़ में क्यों मुझे ये लगता है
ये कोई इम्तिहान है शायद

ज़िंदगी रुक गई है अब ‘रोहित’
उम्र भर की थकान है शायद

रोहित जैन
9-2-2011

Published in: on फ़रवरी 9, 2011 at 7:26 पूर्वाह्न  Comments (3)  
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एक कोशिश

कुछ ख़याल आ रहे थे ज़हन में तो लिखने की कोशिश की है और साथ में एक कोशिश और की है, रदीफ़ में अपना नाम लगाने की…
टिप्पणी का मुन्तज़िर रहूंगा…

सब तो तेरे पास है रोहित
क्या है जिसकी आस है रोहित

एक ख़ुदा ही है जो सच है
बाकी सब बकवास है रोहित

जैसे जीता है तू जी ले
क्या लिखना इतिहास है रोहित

तू भी हड़्ड़ी पसली चमड़ी
कौनसा तू कोई ख़ास है रोहित

एक साथ मुस्कान-ओ-आँसू?
दुनिया का एहसास है रोहित

क्या खुश है तू इन्सां बन के
ये तेरा बनवास है रोहित

चाहे फिर घुटना मरना हो
जीवन सब को रास है रोहित

अस्ल में चाहे दो कौड़ी हो
दिखता सब अल्मास है रोहित

धरती अम्बर एक करेगा
ये कैसा विश्वास है रोहित

बड़ा खा रहा है छोटे को
ये जीने की प्यास है रोहित

वक़्त पड़े छुप जाएगा तू
काहे का बिन्दास है रोहित

जीना है जैसे दिन निकलें
जीना एक सिपास है रोहित

और न शायर का मुँह खुलवा
दिल में बहुत भड़ास है रोहित

रोहित जैन
01-09-2010

अल्मास – Diamond
सिपास – Obligation

Published in: on सितम्बर 2, 2010 at 7:32 पूर्वाह्न  Comments (11)  
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इश्क़ करो और गिने जाओ ख़राब में

ना जाने ये लिखा हुआ है किस किताब में
के इश्क़ करो और गिने जाओ ख़राब में

काँटों ने जब लहू से किया और सुर्ख़ उसे
तब जाके कहीं रंग आया है गुलाब में

चाहा तो था दिल को मिले सुकूं जवाब से
कितने सवाल आते हैं उनके जवाब में

मुझको तो शायद कश्तियां थीं ढ़ूंढ़नी
मै ही यां ड़ूबा हुआ हूं इक सैलाब में

है होश में वही जो मिला आप से हुज़ूर
बाकी सभी भटकते हैं अब तक सराब में

इक यां ही तो मुझे नसीब दीद-ए-यार है
बस एक यही बात तो अच्छी है ख़्वाब में

तूने नज़र उठाई ही क्यों मैक़दे की ओर
कोई मज़ा बाकी ही न रहा शराब में

न जाने तुझे बात याद कौन कौन है
मैने तो इश्क़ में रखा न कुछ हिसाब में

‘रोहित’ को भी ‘ग़ालिब’ की तरह जागना होगा
आने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में

रोहित जैन
01-09-2010

दिल रहता है भरा भरा

गुलज़ार साहब की ग़ज़ल से काफ़िया चुराने की गुस्ताखी कर रहा हूँ, उम्मीद है आप इसके लिये मुझे माफ़ करेंगे…

गलती ही की जो सब बोला खरा खरा
क्या बोलूं अब मै हूँ कितना ड़रा ड़रा

कुछ तो तबियत यारों अपनी नाज़ुक है
और जिगर का ज़ख़्म भी तो है हरा हरा

जब से तूने खाली खाली बातें कीं
तब से मेरा दिल रहता है भरा भरा

चेहरे का बिस्तर भी सिलवट सिलवट है
ज़ीस्त का दफ़्तर भी बिखरा है ज़रा ज़रा

इश्क़, रफ़ाक़त, रिश्ते, पैसा, जागीरें
सब रह जाएगा ऐसे ही धरा धरा

ऐसा क्या बोला ‘रोहित’ इस दुनिया से
जो इन की नज़रों में तू है मरा मरा

रोहित जैन
31-08-2010

शोला-ए-इश्क़ को बुझाना चाहिये था

शोला-ए-इश्क़ को बुझाना चाहिये था
यूँ नहीं ख़ुद को जलाना चाहिये था

मेरी गुमराहियों पर एतराज़ करता था
राह पर मुझको तो लाना चाहिये था

ये कहता है के कुछ नहीं ताबीर मेरी
ख़्वाब तो कोई दिखाना चाहिये था

मेरे दिल था शुबा के अक्स किसका है
नाम तो लेकिन बताना चाहिये था

आज तू कहता है इश्क़ दौलत है
यूँ नहीं मुझको गंवाना चाहिये था

वो भी तन्हा था भरे ज़माने में
मेरे भी दिल को ठिकाना चाहिये था

उन्हे जो साहिलों पे बैठ के भी रोते हैं
तूफ़ान में ही ड़ूब जाना चाहिये था

कब कहा ‘रोहित’ ने क़ायनात मिले
तेरे दिल में आशियाना चाहिये था

रोहित जैन
20-07-2010

दफ़्न कर दिया मुझे मज़ार से बाहर

दफ़्न कर दिया मुझे मज़ार से बाहर
मर के भी आ सका ना इंतज़ार से बाहर

आया था सबसे पहले और अब हाल देखिये
दुनिया ने मुझको कर दिया क़तार से बाहर

मैने जिसे बचाने के लिये छोड़ दी कश्ती
मुझको ड़ुबा के हो गया वो धार से बाहर

शर्ते वफ़ा में हर्फ़ कुछ ऐसे छुपे थे के
सब कुछ किया आ पाया ना क़रार से बाहर

ना आदमी, ना ज़िंदगी ना दिल की अहमियत
कर दे ख़ुदा दुनिया के कारोबार से बाहर

ख़ुद को ही बेचता रहा, खरीदता रहा
कुछ भी नहीं था मेरे ख़ुद-हिसार से बाहर

जितनी भी कोशिशें करीं काबू में आए ये
उतना ही वक़्त होता गया इख़्तियार से बाहर

सब पर यकीं किया तो ना ख़ुद पर यकीं रहा
आना है इस बाज़ार-ए-ऐतबार से बाहर

‘रोहित’ ये बस्ती ख़्वाब की कब तक सजाएगा
दुनिया बहुत अलग है इस गुलज़ार से बाहर

रोहित जैन
19-07-2010