हमने तो जाम में उतारा था

हमने तो जाम में उतारा था
वो जो वादा कभी तुम्हारा था

आँख में आँख का नज़ारा था
एक ऐसा भी इस्तिआरा था

तुम जो आए हो तो भला कैसे
हमने अल्लाह को पुकारा था

हमको तन्हाइयों के सहरा में
अश्क़ के आब का सहारा था

जब तुम से नहीं लगा था दिल
वक़्त तब भी यहां गुज़ारा था

आज तक भूलता नहीं ये दिल
कोई सदक़ा कभी उतारा था

हाय शर्माए थे वो देख मुझे
हाय ज़ुल्फ़ों को भी संवारा था

तेरे वादे से ड़र क्यूं लगता है
तब तो सब कुछ मुझे गंवारा था

तुमने टुकड़े उठाये थे जिसके
हाँ मेरा दिल था, पारा पारा था

आज ‘रोहित’ को कौन समझाए
उसके दिल ने ही उसको मारा था

रोहित जैन
13-11-2014

Published in: on अगस्त 3, 2015 at 7:52 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  
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क्या बात है?

कुछ दिन पहले कृष्ण बिहारी ‘नूर’ साहब का एक शेर पढ़ा.

क्या बताएं क्या अज़ीम उसकी ज़ात है
सागर को सीपियों से उलचने की बात है

इसके मिसरा-ए-ऊला से प्रेरणा ले के एक मतला लिखा और फिर एक ग़ज़ल कहने की कोशिश की है…

आपकी अमूल्य टिप्पणी का मुन्तज़िर हूँ…

तुम इश्क को मेरे परखते हो? क्या बात है?
सागर को सीपियों से उलचते हो? क्या बात है?

जब जानते हो खून तो ताजा ही आएगा
तुम ज़ख्म को अपने खुरचते हो? क्या बात है?

महकते थे बहकते थे मचलते थे संभलते थे
सिसकते हो सुबकते हो? क्या बात है?

26-11-2010

वो बेवफ़ा था, और ये कह भी गया कम्बक़्त वो
तुम उसी की राह तकते हो? क्या बात है?

एक ही मुश्किल है के मुश्किल बहुत है भूलना
पर याद तुम दिन रात करते हो? क्या बात है?

जिस मोड़ से रहने की दूर तुम कसम खा आए थे
उस मोड़ पर अब भी ठहरते हो? क्या बात है?

एक ज़माने में जिन्हे तुम ही ने समझाया था इश्क़
इश्क़ अब उनसे समझते हो? क्या बात है?

आँख की गहराइयों में, दिल के अंधियारों के बीच
यूँ शमा बनकर पिघलते हो? क्या बात है?

दिल गया तो आँख को कैसा दिया है काम ये
बस वही तस्वीर तकते हो? क्या बात है?

तुमने ‘रोहित’ से कहा था इश्क़ ग़म का नाम है
बात से अपनी पलटते हो? क्या बात है?

14-12-2010

Published in: on दिसम्बर 14, 2010 at 2:52 अपराह्न  Comments (4)  
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नज़्म – उसकी छुअन

नज़्म – उसकी छुअन

“रोहित” से पूछते हो किन हालों की तरह छुआ
खुशियों की तरह छुआ, वबालों की तरह छुआ

उसने मेरे अंधेरों को उजालों की तरह छुआ
एक पारसा को ख़ुदा पे सवालों की तरह छुआ

कभी ख्वाब बनके छुआ, ख़यालों की तरह छुआ
चेहरे पे आके बिखरते बालों की तरह छुआ

हक़ीक़त की तरह छुआ, हवालों की तरह छुआ
अफ़वाह सा छुआ और मिसालों की तरह छुआ

धूप-ए-हयात को उसने सर्द गालों की तरह छुआ
बंजर ज़मीं को फ़लभरी ड़ालों की तरह छुआ

मुफ़लिस के हाथ आ गए मालों की तरह छुआ
कभी उसने मुझे शतरंज की चालों की तरह छुआ

जादू के किसी खेल के कमालों की तरह छुआ
हर्फ़-ए-तलब को रंग-ए-मलालों की तरह छुआ

मै कैद हो के रह गया, मुझे जालों की तरह छुआ
कभी मुख़्तसर सा छू लिया कभी मुहालों की तरह छुआ

नाज़ुक अदा से हुस्न-ए-जमालों की तरह छुआ
सूखी सी पत्तियों को मशालों की तरह छुआ

पल की तरह छुआ मुझे, सालों की तरह छुआ
हिज्र सा भी छुआ और विसालों की तरह छुआ

मस्जिदों की तरह छुआ, शिवालों की तरह छुआ
“रोहित” से पूछते हो किन हालों की तरह छुआ

रोहित जैन
01-11-2010

Published in: on नवम्बर 16, 2010 at 4:05 पूर्वाह्न  Comments (2)  
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तू था? तेरा साया था?

तू था? तेरा साया था?
ग़म ने भेस बनाया था

वो आहें मुझ तक पहुँचीं
जिनको तूने लौटाया था

वैसे ही ग़म पाये हैं
जैसे तुझको पाया था

मजनू-ओ-महिवाल का किस्सा
मैने भी दोहराया था

ख़ुशबू आई है झोंके में
तुझसे मिलके आया था

वो लोग हमें समझाते हैं
जिनको हमने समझाया था

जिस हुक़्म से मेरा क़त्ल हुआ
तुझसे ही तो आया था

जिस जिस को अपना समझा
वो ही यहाँ पराया था

दिल में लहरें उठती हैं
इक कंकर टकराया था

‘रोहित’ जिस से चौंका है
वो उसका ही साया था

रोहित जैन
2-11-2010

Published in: on नवम्बर 3, 2010 at 6:18 पूर्वाह्न  Comments (2)  
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कोई सूरज हमारी ताक में है

पसेज़ुल्मत कोई सूरज हमारी ताक में है
इसी उम्मीद का दम अब हमारी ख़ाक में है

नहीं है ख़ौफ़ किसी ज़ुल्म का हमें यारों
आओ देखें के जिगर कितना उस सफ़्फ़ाक में है

जो बदलती है रवानी तो बदल ले कौसर
रुख़ बदलने का हुनर आपके तैराक में है

वजूद अब भी सलामत है जान लो प्यारे
तो क्या हुआ के लिबासेबदन ये चाक में है

बुलंद कितनी भी स्याही फ़रेब की हो यहाँ
इसे पढ़ने का तजुर्बा दिलेख़ाशाक में है

उन्हे हैरत है ग़मेज़िंदगी से खुश हूँ मै
मज़ा अलग ही मिंया दर्द की खुराक में है

ना बुरा मानिये ‘रोहित’ की किसी बात का आप
हज़ार दर्द दिलेबेचारा-ए-बेबाक में है

रोहित जैन
26-11-2008

पसेज़ुल्मत == Beyond the Darkness
सफ़्फ़ाक == Cruel
कौसर == River of Heaven
दिलेख़ाशाक == Destroyed Heart

मोहब्बत में

कुछ ऐसे इश्क़ का धोखा मिँया खाया मोहब्बत में
पराया जुर्म अपने नाम लिखवाया मोहब्बत में

ये मेरा पैर मेरे बस में कब आया मोहब्बत में
नहीं गुमराह होकर राह पा पाया मोहब्बत में

जुनूं जागा जो उसको पा के जब अपना बनाने का
हर इक चादर से बाहर पाँव फैलाया मोहब्बत में

उसे खोकर भटकता हूँ मै बहरेज़िंदगी में अब
बताओ कौन तन्हा पार जा पाया मोहब्बत में

ये मत पूछो के हमको क्या मिला राहेमोहब्बत पर
पिये आँसू हैं हमने और ग़म खाया मोहब्बत में

ज़माने भर में है रुसवा तो इसमें फ़र्क़ ही क्या है
हुआ बदनाम तो क्या नाम तो पाया मोहब्बत में

नहीं हैं वो मगर इक याद तो है साथ में अपने
कम-अज़-कम इतना तो ‘रोहित’ ने कमाया मोहब्बत में

रोहित जैन
21-11-2008

Published in: on नवम्बर 26, 2008 at 10:32 पूर्वाह्न  Comments (1)  
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दास्तां लिख रहा हूँ पानी पर

हार जाने की कामरानी पर               
दास्तां लिख रहा हूँ पानी पर

आपने दिल मेरा जो तोड़ा है
शुक्र करता हूँ मेहरबानी पर

कुछ निशां देखता हूँ मै अपने
आपकी बेनिशां निशानी पर

लुत्फ़ क्या क्या मिला है क्या बोलूं
ज़ायकेमर्ग़ेनागहानी पर                   

जो अभी तक नहीं कही तुमने
रो रहा हूँ उसी कहानी पर

लो छाँव अब शजर ने मांगी है        
शम्स की सोज़ेबेकरानी पर            

लो अहमकाना हो गई है ख़िरद       
लो इश्क़ आ गया रवानी पर

ये इश्क़ है या है फ़रेबेक़ज़ा         
बात अटकी है दर्मियानी पर

निसार जानोदिल किये हमने
तेरी नज़रों की हुक्मरानी पर        

अहलेदुनिया है और है ‘रोहित’        
कैसा उतरा है तुर्कमानी पर         

रोहित जैन
11-11-2008

कामरानी = Success
ज़ायका – Pleasure
मर्ग़-ए-नागहानी – Sudden Death
शजर – Tree
शम्स – Sun
सोज़ – Heat
बेकरानी – Limitless/unbound
अहमकाना – Foolish
ख़िरद – Wisdom
फ़रेबेक़ज़ा – Illusion of Death
हुक्मरानी – Rule
अहलेदुनिया – People of the world
तुर्कमानी – Rebel

सोज़ेदिल में कभी कमी ना हो

सोज़ेदिल में कभी कमी ना हो
ज़िंदगी चाहे ज़िंदगी ना हो

वो मुझे देखते हैं कुछ ऐसे
उनकी आँखों में गो नमी ना हो

राख को भी टटोलकर देखो
आग शायद अभी बुझी ना हो

पूछकर फिर से देख लो तो कहीं
तर्क़ेमोहब्बत दिल्लगी ना हो

आवाज़ वो आती नहीं खुलकर
जो कभी जानेमन दबी ना हो

मैने माना के जी लूंगा तुझ बिन
हाय पर हाल ये कभी ना हो

दुनिया कहती है वो नहीं मेरे
या ख़ुदा बात ये सही ना हो

मै नहीं मानता के उस दिल में
एहसास मेरे वास्ते कहीं ना हो

बस के ‘रोहित’ बहुत हुआ ज़ालिम
दर्द-अफ़्शां ग़ज़लकही ना हो

रोहित जैन
08-11-08

रंग

क्यों सब की ज़ुबाँ पे शिकायत का रंग है
इन्सान की ये कौन सी आदत का रंग है

लड़ते हो ख़ुदाओं के मज़हबों की नाम पर
ना जाने कौन सी ये इबादत का रंग है

अब नहीं ड़रता मै के अंजाम क्या होगा
हर शय में आजकल क़यामत का रंग है

बच्चों की बात में भी वो मासूमियत कहाँ
उन पे भी चढ़ा अब तो नफ़ासत का रंग है

क्यों सोचते हो मुल्क़ के हालात के बारे
तुम्हारी ही चुनी हुई सियासत का रंग है

पहले मै था कैसा और अब क्या हो गया
खुद से करी थी जो उस बगावत का रंग है

रोहित जैन
12/11/2006

Published in: on मार्च 18, 2008 at 6:46 अपराह्न  Comments (2)  
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जुदा

हर ज़ुबाँ से आता हुआ अल्फ़ाज़ जुदा है
सब ही की रवायतों का अंदाज़ जुदा है

मुफ़लिसी हर आँख में किसी ना किसी शय की
अपनी तरह से हर कोई मोहताज जुदा है

मूर्ती भी सजी है मय्यत भी ज़ुल्फ़ भी
फूलों का रंग एक है परवाज़ जुदा है

थे हाथ कभी जोड़ते अब सर पे चढ़े हैं
है शख़्स तो वो ही बस आवाज़ जुदा है

खुशी में भी आते हैं और ग़म में भी यारों
हैं अश्क़ सब की आँख में आग़ाज़ जुदा है

रोहित जैन
12/11/2006