चाँद दर्द का जला, दिल में उतरी चाँदनी

चाँद दर्द का जला, दिल में उतरी चाँदनी
तन्हाई ही छोड़ गई, जहाँ पे बिखरी चाँदनी

ढ़ूंढ़ता ही रह गया सहर, शफ़क, शमा, सुकून
अंधियारा ही हाथ लगा ऐसी गुज़री चाँदनी

यूँ तो मेरी मय्यत पर सूरज भी रोने आया था
इसको ही बस इल्म नहीं, कुछ ना समझी चाँदनी

वो दामन नहीं गरेबाँ था जो फ़टा सा हाथ में आया था
हर एक ताना तोड़ गई कुछ ऐसी अखरी चाँदनी

रोहित जैन
28/03/2007

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खुशबू कोई भटकती हुई साँसों में चली आती है

खुशबू कोई भटकती हुई साँसों में चली आती है
काँच के ख्वाब लाती हैं, हिज्र की बिजली लाती है

जब भी सुनता हूँ मै दिल के बुझ जाने का शोर
हँसने की आवाज़ मेरे ज़ेहन में उतरी जाती है

ख़ैरात-ए-मोहब्बत भी, सुकूँ नहीं देती है हमें
दिल को साथी करते हैं तो बेचैनी भी आती है

धुआँ भी तन्हा होता है, वो लौ भी तो तन्हाई है
तन्हाई जब आती है संग तन्हाई ही लाती है

दर्द शमा है, हमेशा तो नहीं जलने वाला
रोशनी-ए-चाँद-ए-ग़म एक दिन बुझ ही जाती है

साँसें भरना जीना है, तो फ़िर सब ही ज़िंदा हैं
धज्जी धज्जी ज़र्रा ज़र्रा साँस बिखरी जाती है

तन्हाई तन्हाई है, अब इस से ज़्यादा क्या बोलूँ
तन्हाई के सेहरा में बस ग़मों की आँधी आती है

रोहित जैन
26/03/2007

आजकल उनसे तबियत नहीं मिलती

आजकल उनसे तबियत नहीं मिलती
अब वो पहले सी राहत नहीं मिलती

हम ही हैं जिसको नसीब हिज्र है
सब को शब-ए-फ़ुरक़त नहीं मिलती

इश्क़ से धुल गया है सारा जहाँ
किसी से किसी की सूरत नहीं मिलती

आँख चुराते हैं और चले जाते हैं
अब उन लबों से शिकायत नहीं मिलती

तू नहीं है तो तेरी याद है हर पल
अब कहीं मुझको ख़िलवत नहीं मिलती

रोहित जैन
21/03/2007

शब-ए-फ़ुरक़त = Night Of Seperation
ख़िलवत = Solitude

मोहब्बत नये पर लगाकर उड़ा दी

मोहब्बत नये पर लगाकर उड़ा दी
मेरी ख़ाक जुगनू बनाकर उड़ा दी

अंधेरे की कालिख तो रहने दो मुझ पर
चाँदनी तो तुमने बुझाकर उड़ा दी

गुल ख़ार तक चमन ढ़क गया है
मेरी ज़िंदगी यूँ जलाकर उड़ा दी

यही एक भरम तो बचा था सितमगर
मेरी दास्ताँ भी सुनाकर उड़ा दी

लगाई है मुझ पर मोहब्बत की तोहमत
मेरी बंदगी सर झुकाकर उड़ा दी

रोहित जैन
11/03/2007

ज़रा पास ना आओ मुझे क़रार आ जाये

ज़रा पास ना आओ मुझे क़रार आ जाये
ज़रा लटों को उलझाओ मुझे क़रार आ जाये

ढ़क लो ज़रा आँचल, कर लो थोड़ा परदा
ज़रा खुल के शरमाओ मुझे क़रार आ जाये

कुछ दूर बैठो तुम, करने दो तमन्ना
ज़रा ख़लिश को बढ़ाओ मुझे क़रार आ जाये

शिकवा करो कोई, कुछ तो गिला रहे
ज़रा रूठ भी जाओ मुझे क़रार आ जाये

कोई तन्ज़ नहीं है, ना कोई बात बनी है
ज़रा लोगों को समझाओ मुझे क़रार आ जाये

रोहित जैन
12/03/2007
 

उसकी गली में यारों आज उससे सामना है

उसकी गली में यारों आज उससे सामना है
कहीं हाथ से ना जाये इस जाँ को थामन है

पहले तो इस जहाँ ने हँसना बनाया मुश्किल
रोने भी अब ना देंगे के ये भी तो अब मना है

किसको बताऊँ मुजरिम किस पर करूँ मुकदमा
हर हाथ में है खंजर जो खून से सना है

अश्क़ों की झील में ये कश्ती मेरी फ़ँसी है
मेरे ग़म की वादियों में कोहरा बड़ा घना है

रोहित जैन
09/03/2007

मस्जिदों में भी साक़ी का नाम लेता हूँ

मस्जिदों में भी साक़ी का नाम लेता हूँ
वूज़ू के वास्ते हाथों में जाम लेता हूँ

नशा कराके तो सब ही गिराया करते हैं
मेरी फ़ितरत है गिरतों को थाम लेता हूँ

सब से छुप के मोहब्बत में कोई लम्स नहीं
मै तो वादा-ए-दीदार-ए-आम लेता हूँ

रोहित जैन
09/03/2007

हाथ कुछ आया नहीं बेरुखी के सिवा

हाथ कुछ आया नहीं बेरुखी के सिवा
वो और कुछ नहीं था एक अजनबी के सिवा

ना जफ़ाएं ना तक़ाज़े ना बेरुखी ना दगा
हमको कुछ नहीं आता है दोस्ती के सिवा

हर कदम पर नयी मंज़िलें आईं नज़र
जहाँ में कुछ ना बचा आवारगी के सिवा

कभी यार कभी प्यार कभी खुदापरस्त
सब बन के रह गया एक आदमी के सिवा

जानकर आगाह नहीं हम तदबीर-ए-सैयाद से
लेकर वो जायेगा भी क्या ज़िन्दगी के सिवा

सूरज भी इतना दूर है के दिया लगता है
कोई चीज़ दिखती नहीं तिशनगी के सिवा

रोहित जैन
07/03/2007

शाम खाली है जाम खाली है

शाम खाली है जाम खाली है
ज़िन्दगी यूँ गुज़रने वाली है

सब लूट लिया तुमने जानेजाँ मेरा
मैने तन्हाई मगर बचा ली है

किसी दरख़्त पर बना दिल है
तेरी हर याद यूँ संभाली है

दिल किसी का ज़रूर तोड़ा है
आज रुख़ पर नई सी लाली है

मुख़्तलिफ़ ख़्वाब सबकी आँखों में
तुम ने सब में जगह बना ली है

दिल के टुकड़े तलाशता हूँ अब
दोस्ती क़ैस से निभा ली है

क़त्ल कैसा गज़ब किया तुमने
ये मेरी ज़िन्दगी बचा ली है

ज़रा दिल भी जला दो अब मेरा
रात अब भी सियाह काली है

गया काबा गया मै काशी भी
हर जगह पर जनाब-ए-आली है

रोहित जैन
04/03/2007

क़ैस == Majnoo

Published in: on फ़रवरी 20, 2008 at 11:00 पूर्वाह्न  Comments (1)  
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उसे प्यार करने में मै अपना घर जला बैठा

उसे प्यार करने में मै अपना घर जला बैठा
खुद अपने ही सीने पे एक नश्तर चला बैठा

हर बार सोचता था बदलूंगा आप को
हर बार उसी भूल का खंजर चला बैठा

जब भी जताया हक़, हक़ से मै जल गया
एक बार नहीं हाथ मै अक़्सर जला बैठा

जिस राह पर ठोकर लगी उस राह पर वापस
जाकर मै सोचता हूँ क्यों इस पर भला बैठा

समझा जो किसी और का मेरा ही अक्स था
अपने ही आईने पे मै पत्थर चला बैठा

रोहित जैन
01/03/2007