वो मेरा था मगर मेरा कहां था

उफ़क़ को देखकर ऐसा गुमां था
ज़मीं की दोस्ती में आसमां था

कोई उलझन नहीं थी इस से बढ़कर
वो मेरा था मगर मेरा कहां था

हुनर ही था, इसे क्या और कहिये
बड़ी तहज़ीब से नामेहरबां था

ज़मीर आया मेरी आँखों के आगे
वगरना मै भी उसका राज़दां था

यकीं तो था मुझे पर कुछ कमी थी
अजब सा फ़ासिला इक दर्मियां था

ख़ता थी, हाँ ख़ता ही थी वो मेरी
मुझे था प्यार और बेइन्तिहां था

ज़हन अहमक़ ज़बां नादां थी उसकी
मगर दिल से बुरा ‘रोहित’ कहां था

रोहित जैन
07-03-2011

उफ़क़ – Horizon
नामेहरबां – Rude
वगरना – Otherwise
अहमक़ – Foolish/Immature

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एक काव्यात्मक गुस्ताखी

आपकी अमूल्य टिप्पणी का मुंतज़िर हूँ…

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बुझती हुई शमा का ज़रा दम तो देखिये
आप उसकी कोशिशों का वो परचम तो देखिये

अब ये कहाँ की बात के कमरे में बंद हो
निकल के आस पास का मौसम तो देखिये

ठीक के सुनती नहीं है आपको दिल की सदा
कुछ नहीं तो आँख ये पुरनम तो देखिये

 
भड़की हुई शमा का ज़रा दम संभालिये
अब आग बुझाने का ये परचम संभालिये

बुझ रहा है फ़िज़ाओं में ये रंगीनियों का जश्न
अब आप ही आके ज़रा मौसम संभालिये

दिल की सदा सुनाऊंगा महफ़िल में आज मै
आँख ना हो जाये ये पुरनम संभालिये

 

शम्मा की लौ से आज ज़रा दम समेट लूँ
उस ने उठा रखा है जो परचम समेट लूँ

आया हूँ तेरे शहर में, इतना तो मै करूँ
तेरी अदाओं से बना मौसम समेट लूँ

ठहरो अभी आओ नहीं मेरे करीब तुम
रुक जाओ ज़रा आँख ये पुरनम समेट लूँ

 

रोहित जैन
13-03-2008

उस इम्तिहान के पल में हम क्या कहें के झिझक गए

मेरे अश्क़ेनामुराद यूं, निगाह से थे छलक गए
चरागेदिल को बुझा गए, ये आज ऐसे चमक गए

हमें प्यास थी दीदार की, हो जाए झलक रुख़ेयार की
जिस पल गिरा उनका नक़ाब, उसी पल में पलकें झपक गए

मिलके भी तो हम ना मिले, थे दर्मियां कई फ़ासले
और वहशतेइश्क़ में, हम राह अपनी भटक गए

जो उन से मिली मेरी नज़र, उतरी बची सारी कसर
चले थे गुल की तलाश में, और ख़ार में हम अटक गए

शाखेज़हन की कली कली, महकी थी उसके ख़याल से
वो तस्सवुरेजाना किया, हम डाली डाली लचक गए

मुझे इश्क़ बेशुमार था, उसे भी कहां इनकार था
उस इम्तिहान के पल में हम क्या कहें के झिझक गए

रोहित जैन
31-03-2008

उसकी गली में देख तो मुझे आज मेरा पता मिला

उसकी गली में देख तो मुझे आज मेरा पता मिला
दैरोहरम भटका किया, दिलेबेख़बर में खुदा मिला

जिस मोड़ से मै बचा किया, जिस राह से रहा दूर दूर
उसी राह के उस मोड़ पर वो चराग़ लेके खड़ा मिला

क्या क्या जतन किया किये बचा के रखने को आशियां
वो ही आशियां जो सहर हुई तो आज मुझको जला मिला

जो रोशनी का पयाम था मेरे घर से तुम्हारे घर तलक
वही चाँद टहनी की आड़ में तेरी छत पे मुझको छुपा मिला

सौ जतन किये थे चाह में, कई फूल बिछाये थे राह में
कुछ भी ख़ता तो करी नहीं फिर आज क्यों वो ख़फ़ा मिला

जिसे भर रखा था ख़याल से, तेरी याद तेरे विसाल से
वो ख़्वाब था जो छलक गया, इक खाली जाम पड़ा मिला

मुझे याद भी नहीं था जो, वो दिखा तो मुझको पता चला
जो ढ़का था वक़्त की गर्द से वो रिश्ता कहीं से जुड़ा मिला

इक काफ़िला था गुज़र गया, आईने से चेहरा उतर गया
वो गुबार और वो चमक गई तो वो शख़्स मुझसे जुदा मिला

वो ही हैरतें वो ही हसरतें वो मोहब्बतों की नुमाइशें
मेरे नसीब में सिलसिला मुझे इन सभी का लिखा मिला
रोहित जैन
31-03-2007

रदीफ़ का खेल…..

पैमानेग़म बिखर गया तो मुश्किल होगी
ये दिल से उतर गया तो मुश्किल होगी

उसे देखा है आज मुद्दतों के बाद कहीं
ये दिन भी गुज़र गया तो मुश्किल होगी

बमुश्किल हुआ, खाली हुआ अश्कों से ये दिल
ये फिर से जो भर गया तो मुश्किल होगी

हमको आता ही क्या है मोहब्बत के सिवा
ये भी जो हुनर गया तो मुश्किल होगी

वो ख्वाब में आके मुझे हौंसला देता तो है
ये सिलसिला ठहर गया तो मुश्किल होगी

अब और मत लीजिये दिल का इम्तिहान
ये दिल कुछ कर गया तो मुश्किल होगी

आदत सी है इसको तो अब वीरानों की
ये दिल जो संवर गया तो मुश्किल होगी

दिल पहले ही वहशतज़दा है, बस कीजिये
ये ग़र और ड़र गया तो मुश्किल होगी

खुश है ये देखो तो आवारामिजाज़ी से
ये लौट के घर गया तो मुश्किल होगी

वो समझता है मोहब्बत मेरी इबादत को
ये इल्ज़ाम धर गया तो मुश्किल होगी

बस यादों की उड़ानों में ही मिलता हूँ उसे
ये पर भी क़तर गया तो मुश्किल होगी

रोहित जैन
25-03-2008

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अब थोड़ा सा खेल रहा हूँ रदीफ़ के साथ, देखिये किस तरह ग़ज़ल का मूड़ बदलता है….

पैमानेग़म बिखर गया तो मज़ा
ये दिल से उतर गया तो मज़ा

उसे देखा है आज मुद्दतों के बाद कहीं
ये दिन भी गुज़र गया तो मज़ा

बमुश्किल हुआ, खाली हुआ अश्कों से ये दिल
ये फिर से जो भर गया तो मज़ा

हमको आता ही क्या है मोहब्बत के सिवा
ये भी जो हुनर गया तो मज़ा

वो ख्वाब में आके मुझे हौंसला देता तो है
ये सिलसिला ठहर गया तो मज़ा

अब और मत लीजिये दिल का इम्तिहान
ये दिल कुछ कर गया तो मज़ा

आदत सी है इसको तो अब वीरानों की
ये दिल जो संवर गया तो मज़ा

दिल पहले ही वहशतज़दा है, बस कीजिये
ये ग़र और ड़र गया तो मज़ा

खुश है ये देखो तो आवारामिजाज़ी से
ये लौट के घर गया तो मज़ा

वो समझता है मोहब्बत मेरी इबादत को
ये इल्ज़ाम धर गया तो मज़ा

बस यादों की उड़ानों में ही मिलता हूँ उसे
ये पर भी क़तर गया तो मज़ा

रोहित जैन
25-03-2008

खतरे में है

कोई नहीं ये जानता के वो कब खतरे में है
ज़िंदगी जीने का देखो हर सबब खतरे में है

कोई यहां मंदिर को तोड़े, कोई ढ़ाए मस्जिदें
क्या ज़माना आ गया है अब तो रब खतरे में है

सोचते थे के यहां कानून है, बच जायेंगे
एक थी उम्मीद लेकिन वो भी अब खतरे में है

अब किसी की आँख में हैं चैन की नींदें कहां
दिन भी खतरों से भरा था और शब खतरे में है

वो शरीक-ए-जुर्म है तो फ़िक़्र वो फिर क्यों करे
जिसकी कोई ख़ता नहीं वो बेसबब खतरे में है

अब सभी को नाम लेकर सब बुलाते हैं यहां
बदले ज़माने में पुराना हर अदब खतरे में है

क्या रखें उम्मीद अब हम यार-रिश्तेदार से
क्या मदद उस से मिलेगी वो ही जब खतरे में है
रोहित जैन
23-03-2008

Published in: on मार्च 24, 2008 at 11:59 पूर्वाह्न  Comments (3)  
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क्यों नहीं जाता

ये ज़ख़्म-ए-जुदाई मेरा भर क्यों नहीं जाता
वो शख़्स मेरे दिल से उतर क्यों नहीं जाता

कब तक रहूं हैरान परेशान हर घड़ी
वो शख़्स कोई फ़ैसला कर क्यों नहीं जाता

क्यों मेरे ही पहलू में ये आता है लौटकर
ये ग़म ज़रा पूछो के उधर क्यों नहीं जाता

हर बार मेरे ज़ेहन में बस वो ही इक ख़याल
चाहूं भुलाना लाख मगर क्यों नहीं जाता

पहले तो कभी खोने का तुझको था ड़र मुझे
अब तेरे कहीं मिल जाने का ड़र क्यों नहीं जाता

क्या क्या जुड़ीं है याद क़यामत सी उस जगह
बस मै ही जानता हूं मै घर क्यों नहीं जाता

क्यों साँस ले रहा है वो बेजान रूह में
कह दो ज़रा ‘रोहित’ से के मर क्यों नहीं जाता

रोहित जैन
09-03-2008

हुआ होगा

मै जानता हूं के वहां पे क्या हुआ होगा
सच्चाई की आवाज़ पे हमला हुआ होगा

सुनता हूं वहां भूख से इक और मर गया
दिल्ली में नया बहस का मुद्दा हुआ होगा

इक और पंछी उड़ गया है आज क़ैद से
फिर से कोई सैयाद अब रुसवा हुआ होगा

लो फिर किसी गरीब ने दी है नई आवाज़
फिर से किसी शरीफ़ को शिकवा हुआ होगा

कोई उठा रहा है अब आवाज़ेइन्क़िलाब
फिर से किसी किताब से फ़तवा हुआ होगा

वो शख़्स कह रहा है के बदला है ये जहान
कह दो उसे उस को कोई धोखा हुआ होगा

उस सड़क पर इक और फिर आया चपेट में
कुछ देर को फिर से वहां मजमा हुआ होगा

वो बिलावजह मरा मिला तो ये जान लो
उसका भी किसी बात पे चर्चा हुआ होगा

रोहित जैन
09-03-2008

Published in: on मार्च 10, 2008 at 12:34 अपराह्न  Comments (2)  
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देख तो

कैसा सजा है आज ये बाज़ार देख तो
इन्सान ही इन्सां का खरीदार देख तो

कैसा लगा है आज ये दरबार देख तो
मुंसिफ़ ही क़ातिलों में है शुमार देख तो

हर शख़्स ही यहां ज़ेरेदीवार देख तो
सूरज की रोशनी से ये क़रार देख तो

ये तमाशा-ए-जहान यार देख तो
चराग से जलती है अब दीवार देख तो

जिस शख़्स को धोखा मिला हर बार देख तो
वो फिर भी कर रहा है ऐतबार देख तो

आँखों के चारसूं का ये ग़ुबार देख तो
क्या फिर से जल गई है ये बहार देख तो

अब हश्र से होने लगा है प्यार देख तो
ये रूह बिखरने को है तैयार देख तो
रोहित जैन
09-03-2008

Published in: on मार्च 10, 2008 at 10:44 पूर्वाह्न  Comments (2)  
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मां

This is a poem I wrote for my Ma on her Birthday.

She cried reading it just the way I had cried while writing the poem.
Even my Dad was into tears on reading this poem.

I bet anyone who loves his/her mother and family is bound to cry on this.

Please post replies and let me know your views on this one.

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मै रोया यहां दूर देस वहां भीग गया तेरा आंचल
तू रात को सोती उठ बैठी हुई तेरे दिल में हलचल
जो इतनी दूर चला आया ये कैसा प्यार तेरा है मां
सब ग़म ऐसे दूर हुए तेरा सर पर हाथ फिरा है मां
जीवन का कैसा खेल है ये मां तुझसे दूर हुआ हूं मै
वक़्त के हाथों की कठपुतली कैसा मजबूर हुआ हूं मै
जब भी मै तन्हा होता हूँ, मां तुझको गले लगाना है
भीड़ बहुत है दुनिया में तेरी बाहों में आना है
जब भी मै ठोकर खाता था मां तूने मुझे उठाया है
थक कर हार नहीं मानूं ये तूने ही समझाया है
मै आज जहां भी पहुंचा हूँ मां तेरे प्यार की शक्ति है
पर पहुंचा मै कितना दूर तू मेरी राहें तकती है
छोती छोटी बातों पर मां मुझको ध्यान तू करती है
चौखट की हर आहट पर मुझको पहचान तू करती है
कैसे बंधन में जकड़ा हूँ दो-चार दिनों आ पाता हूँ
बस देखती रहती है मुझको आँखों में नहीं समाता हूँ
तू चाहती है मुझको रोके मुझे सदा पास रखे अपने
पर भेजती है तू ये कह के जा पूरे कर अपने सपने
अपने सपने भूल के मां तू मेरे सपने जीती है
होठों से मुस्काती है दूरी के आंसू पीती है
बस एक बार तू कह दे मां मै पास तेरे रुक जाऊंगा
गोद में तेरी सर होगा मै वापस कभी ना जाऊंगा

रोहित जैन
19-03-2006

Published in: on फ़रवरी 26, 2008 at 6:35 अपराह्न  Comments (19)  
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