रुसवाई

हर इक बाज़ी हार चुके हैं, खेल में हर इक मात हुई
दिन के उजियारे दुनिया में लेकिन दिल में रात हुई

जिसको हमने प्यार किया उसने ही दुश्मन मान लिया
कैसे सिफ़र हुए हैं अब हम, क्या अपनी औक़ात हुई

यूँ तो कल ही बिछड़े हैं हम फिर क्यों ऐसा लगता है
कितना अरसा बीत चुका है के जब तुमसे बात हुई

ग़म के क़ाज़ी ने पूछा तो हमने कहा क़बूल क़बूल
दिल के टुकड़ों की दावत है, अश्क़ों की बारात हुई

हमने सोचा कुछ तो मुक़द्दर बदलेगा बरसातों में
ऐसी किस्मत पाई है के पत्थर की बरसात हुई

अहलेदुनिया की ठोकर तो कितनी खाईं ‘रोहित’ ने
आपने भी जब ठोकर मारी, रुसवा अपनी ज़ात हुई

रोहित जैन
24-02-2011

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Published in: on मार्च 3, 2011 at 8:33 पूर्वाह्न  Comments (3)  
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रिश्ता

कैसे रिश्ते खत्म किये जाते हैं मेरे यार सिखा दे
कैसे भूल गया तू मेरा प्यार सिखा दे
मै तो अब तक भूल नहीं पाता हूँ तुझको
अपने ख़्वाबों, यादों में पाता हूँ तुझको
तेरे जैसा मेरा कोई और नहीं था
दूर भी था मुझसे और मुझसे दूर नहीं था
कैसे दिल की बातें सब कर लेते थे हम
इक दूजे को यार सलाहें देते थे हम
सारे ड़र, सारी खुशियां और सारे ही ग़म
कैसे बांट लिया करते थे यार मेरे हम
औरों से भी पूछने जो होते थे हमको
इक दूजे से पूछ लिया करते थे उनको
कैसे हल हो जाते थे सवाल वो सारे
कैसे भूल गया तू माह-ओ-साल वो सारे
पहले जब इक दिन भी बात नहीं होती थी
चैन का दिन और चैन की रात नहीं होती थी
रातें जगकर, सब बातों से वक़्त बचाकर
चैन मिला करता था दिल का हाल सुनाकर
छोटी छोटी बातें भी कहनी होती थीं
इक दूजे के ड़ांटें भी सहनी होती थीं
कितना फ़ख़्र किया करते थे इक दूजे पर
और ऐतबार किया करते थे इक दूजे पर
दुनिया को मिसाल देते थे अपनी यारी की
सबसे कहते थे दूजे की दिलदारी की
दिल का रिश्ता था लोगों की समझ से आगे
इख़लास का रिश्ता था दुनिया की पहुंच से आगे

जाने किस की नज़र लगी है इस रिश्ते को?

रोहित जैन
11-02-2011

शायद

दिल मेरा बेज़ुबान है शायद
फ़ासिला दर्मियान है शायद

उसने बोला है भूल जाऊं उसे
काम इतना आसान है शायद

ड़ूबते दिल की शाम ऐसी है
जल रहा आसमान है शायद

7-2-2011

हमपे सारे सितम नहीं गुज़रे
वो ख़ुदा मेहरबान है शायद

फ़क़त उनकी ही चाह है दिल को
कोई बच्चा नादान है शायद

लब सिले हैं तो कौन रोता है
ज़ख़्म की भी ज़बान है शायद

हिज्र की बात पे वो चुप से हैं
इक बड़ी दास्तान है शायद

मै बुरा हूं ये तेरे लब्ज़ नहीं
दुश्मनों का बयान है शायद

इश्क़ में क्यों मुझे ये लगता है
ये कोई इम्तिहान है शायद

ज़िंदगी रुक गई है अब ‘रोहित’
उम्र भर की थकान है शायद

रोहित जैन
9-2-2011

Published in: on फ़रवरी 9, 2011 at 7:26 पूर्वाह्न  Comments (3)  
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वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है

वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है
बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है

वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम हंसे थे इत्तेफ़ाक़न
अब यूं हुआ के सावन आँखों में आ बसा है

काफ़ी थे चंद लम्हे तेरे साथ के सितमगर
ये क्या किया है तूने ख़्वाबों में आ बसा है

अब तो वो ही है साहिल, तूफ़ान भी वो ही है
कुछ इस तरह से दिल की मौजों में आ बसा है

उम्मीद-ओ-हौंसला भी, रिश्ता भी है, ख़ला भी
वो ज़िंदगी के सारे नामों में आ बसा है

कुछ रफ़्ता रफ़्ता आता, मुझको पता तो चलता
वो शख़्स एक दम ही आहों में आ बसा है

उस की पहुंच गज़ब है, वो देखो किस तरह से
दिन में भी आ बसा है रातों में आ बसा है

क्या बोलता हूं ‘रोहित’, के पूछती है दुनिया
वो कौन है जो तेरी बातों में आ बसा है

रोहित जैन
08-02-2008

देख लूँ

कुछ गिरा है, मै यहां पर क्या गिरा है देख लूँ
है लहू किसका ये उसका या मिरा है देख लूँ

मै नहीं जाता था बुतखाने मगर आया हूँ अब
सुन रहा हूँ के यहां चेहरा तिरा है, देख लूँ

मै चला था जिस जगह से फिर वहीं पर आ गया
किस तरह ये वक़्त का पहिया फिरा है देख लूँ

क्यों नज़र आता नहीं कुछ भी मुझे इस शहर में
किसका दिल जलता है जो कोहरा घिरा है देख लूँ

मै तो सब टूटे सिरों को घर पे आया था छुपा
फिर जो उलझा आज है वो क्या सिरा है देख लूँ

ये लहू कैसा है फैला सुर्ख़ है सारी फ़िज़ा
क्या ये दिल ‘रोहित’ का है जो के चिरा है देख लूँ
रोहित जैन
07-02-2008

Published in: on सितम्बर 27, 2008 at 8:40 पूर्वाह्न  Comments (3)  
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खुशबू जैसे सब रिश्ते हैं

खुशबू जैसे सब रिश्ते हैं, जितना थामूं उड़ जाते हैं
इन रस्तों में कुछ गड़बड़ है, उसकी जानिब मुड़ जाते हैं

मान रहा हूं दिल टूटा है, दर्द का रिश्ता भी झूठा है
पर मानो मै रोक रहा हूँ, फिर भी रिश्ते जुड़ जाते हैं

आँख से है ओझल वो चेहरा, दिल पे पर बोझल वो चेहरा
कुछ घबरा के कुछ शरमा के, फिर तेरे दर मुड़ जाते हैं

पहले तो दिन ही मुश्किल थे, अब तो जीना भी मुश्किल है
कल के ग़म अब तक बाकी हैं, रोज़ नये कुछ जुड़ जाते हैं

कोई हल हो कोई दवा हो, कुछ तो कम जीने की सज़ा हो
सोच रहा हूं पंख लगाकर ‘रोहित’ दुनिया से उड़ जाते हैं

 

रोहित जैन
29-02-2008

ना रहा

ज़मीन भी जाती रही और आसमान भी ना रहा
पर कटे परिंदे में उड़ने का अरमान भी ना रहा

पहले तो अपने होने का वहम होता था उसे
अब तो ये सूरत है उसका ये गुमान भी ना रहा

महलों में रहने की मैने ख्वाहिश क्या करी
हाय! वो पुरखों का कच्चा मकान भी ना रहा

दैर-ओ-हरम तो कभी वाइज़-ओ-रिंद मिलते रहे
इन सब में ऐसा उलझा अब वो इन्सान भी ना रहा

पायल क्या ये इल्म नहीं, झंकार की दरकार है
कोई उन्हे समझाये इश्क़ इतना आसान भी ना रहा

उसको भुलाते भुलाते खुद की पहचान खो गई
तीर छूटा ये कुछ ऐसा के कमान भी ना रहा

रोहित जैन
20/02/2007

Published in: on मार्च 21, 2008 at 2:31 अपराह्न  Comments (1)  
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दुख के चेहरे पर लकीरें याद की

दुख के चेहरे पर लकीरें याद की
सुन रहा हूं सदा दिलेबरबाद की

तेरी महफ़िल तेरा परचम ओ’ हुजूम
अब किसे है फ़िक़्र इस नाशाद की

तूने जीते जी ही मारा है मुझे
अब ज़रूरत ही नहीं जल्लाद की

क्यों न टूटूं क्यों न रो’ऊं ये बता
इन्सान हूँ, मूरत नहीं फ़ौलाद की

है तबियत ये के खुद मिट जायेंगे
क्या ज़रूरत है किसी की याद की

मुझसे बोला अब ज़माने से न बोल
और ना तौहीन कर फ़रियाद की

जो क़रम होता नहीं तो ना सही
हमको भी आदत नहीं है दाद की

सोचता हूं के परों को तोड़ना
आपकी फ़ितरत है या सैय्याद की

हर तरह से तोड़ के देखा ये दिल
है ज़रूरत अब नई ईजाद की

पूरी महफ़िल ही ग़मों में चूर है
क्या करें कोशिश अब इसकी शाद की

क्या इमारत क्या मकां क्या झोंपड़ा
तोड़ दी बुनियाद हर बुनियाद की
रोहित जैन
28-02-2008

हम भी जिगर पे इख़्तियार रख लेंगे

हम भी जिगर पे इख़्तियार रख लेंगे
बंद आँखों में छुपा के प्यार रख लेंगे

एक पल क्या है तू जो कह दे तो
तमाम उम्र का हम इंतज़ार रख लेंगे

तेरी रुसवाई जो हो हमसे बात करने में
तुझे मिलेंगे और दिल को मार रख लेंगे

जो मन्नतें दैर-ओ-हरम की फलतीं हों
एकाध क्या है हम मन्नत हज़ार रख लेंगे

बस एक बार उठा दे ज़रा तू रुख़ से नक़ाब
उस एक याद से उम्र-ए-क़रार रख लेंगे

रोहित जैन
26-02-2008

सब्र हम यूँ इख़्तियार करते हैं

सब्र हम यूँ इख़्तियार करते हैं
होता नहीं है बेक़ार करते हैं

हमको मालूम है वो है बेवफ़ा
फिर भी हम ऐतबार करते हैं

जिसको अपनी ही कोई ख़बर नहीं
उसी का हम इंतज़ार करते हैं

कभी टिकते ही नहीं हैं ये जज़्बे
ज़िंदगी रहगुज़ार करते हैं

जिसने हर बार हमे तक़लीफ़ ही दी
भूल वो ही बार बार करते हैं

बस सोचते ही रह जाते हैं हम
पर नहीं इख़्तियार करते हैं

इनके होते कुछ दिखता ही नहीं
अश्क़ आँखों में गुबार करते हैं

उनको ज़रूरत ही क्या है तीरों की
वो नज़र से ही शिक़ार करते हैं

जब सबने सुने किस्से अंजाम के हैं
लोग क्यों फिर भी प्यार करते हैं

जब सभी के दिल परेशां हैं यहां
चलो हम भी बेक़रार करते हैं

सब जानते हैं क्या मिलेगा वहां
फिर भी नहीं होशियार करते हैं

गर आज कोई नहीं है फ़ना होने को
ख़ुद को हम उम्मीदवार करते हैं

जो भुला नहीं पाते अपना माज़ी
हर बात पे ये आशक़ार करते हैं

आओ आज ख़ुद ही क़त्ल होते हैं
आओ ख़ुद ही को मज़ार करते हैं

एक हम ही नहीं उनपे मर मिटनेवाले
ये काम तो सौ-हज़ार करते हैं

एक नज़र देख लीजिये हमको भी
ख़ुद को हम बादाख़्वार करते हैं

कोई तो बता दो के कहें कैसे
के हम भी तो उनको प्यार करते हैं

जिस लब्ज़ में ना ज़िक़्र हो उन का
उस लब्ज़ को हम नागवार करते हैं

रोहित जैन
25-02-2008