है दर्द भी अजीब

है दर्द भी अजीब, कैसा खेल करता है
भरा जो एक ज़ख़्म, एक नया उभरता है

गिनूं तो दिन हुए कितने बिछड़ के उनसे मुझे
वो लम्हा दिल पे मेरे बारहा गुज़रता है

मै आँख भर के कई बार रो चुका हूँ मगर
ना जाने कौन नए अश्क़ इनमें भरता है

है इस क़दर को बदनसीब बदनसीबी यहां
हर एक श्ख़्स बला नाम इसके करता है

वो मुझसे कहता तो था उम्रभर की दोस्ती है
जो वक़्त मेरा बुरा है तो अब मुकरता है

क्या तेरा कोई हक़ चुरा लिया है मैने अज़ाब?
जो घूम फिर के तू मेरे ही दर ठहरता है

उसे मै भूल गया हूं मुझे यकीं है तो फिर
ये कौन मुझको मुसलसल उदास करता है

ये कैसा ग़म का तलातुम है तू बता ‘रोहित’
जो मुझको और ड़ुबाता है जो उतरता है

रोहित जैन
25-04-2011

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परिन्दे

कैसी उड़ान में हैं ये ख़्वाबों के परिन्दे
ख़्वाहिश के आसमां में अज़ाबों के परिन्दे

शाखों पे मेरे दर्द की बैठे हैं सब के सब
उड़ के जो आए थे तेरी यादों के परिन्दे

कब तक रखेंगे क़ैद इन्हें आप जिस्म में
छूटेंगे किसी रोज़ तो साँसों के परिन्दे

छुप जाएगी वो रोशनी, हिल जाएगा वो अर्श
ग़मेदिल से रिहा होंगे जो आहों के परिन्दे

टुकड़े बिखेरते चले हम दिल के हर तरफ़
हमको दुआएं देते हैं राहों के परिन्दे

‘रोहित’ किसी के दिल को पढ़ेगा तो किस तरह
चेहरे को ढ़क रहे हैं नक़ाबों के परिन्दे

रोहित जैन
01-04-2011

Published in: on अप्रैल 4, 2011 at 5:33 अपराह्न  Comments (5)  
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हो गए इम्तिहान बहुत

देखे हैं इन्सान बहुत
सब ही हैं हैरान बहुत

ऐ ख़ुदा अब बस भी कर दे
हो गए इम्तिहान बहुत

कुछ रातें अब भूखी होंगी
आए हैं महमान बहुत

सच कहना कितना मुश्क़िल था
लगता था आसान बहुत

जाने कैसे कर गुज़रा सब
मै भी हूं हैरान बहुत

सब ग़म उनसे ही मिलते हैं
जिनसे हो पहचान बहुत

बस कहने की बातें हैं ये
के देखे हैं तूफ़ान बहुत

तुम भी कुछ ग़म दे सकते हो
अब भी बाकी है जान बहुत

‘रोहित’ थका अभी से है तू
अभी दूर है आसमान बहुत

रोहित जैन
30-04-2008

आज तक उन खुशबुओं का सिलसिला तोड़ा नहीं

आज तक उन खुशबुओं का सिलसिला तोड़ा नहीं
दिल अपना जलाया मगर उसका दिल तोड़ा नहीं

तुम भी देके देख लो, ग़म से मै ड़रता नहीं
जैसी भी रही ज़िंदगी मुँह कभी मोड़ा नहीं

रात कि महफ़िल सजी थी, चाँद का गिलास था
ग़म पिये तो क्या हुआ पर वो मज़ा छोड़ा नहीं

ये भी क्या सवाल है के इश्क़ कितना चाहिये
दिल तो बच्चे की तरह है, सब मिले थोड़ा नहीं

ये इश्क़ का तूफ़ान है, कोई सलामत ना रहा
जानता था मै भी ये पर नाव को मोड़ा नहीं

अब तो ‘रोहित’ को बताओ अस्ल में लिक्खा था क्या
आज तक समझा नहीं, पुर्ज़ों को भी जोड़ा नहीं

रोहित जैन
24-04-2008

शौक़ है

सुबह सुबह कुछ ख़याल आये ज़हन में तो लब्ज़ों ने ढ़ाल दिये….
ग़ज़ल लिखने की कोशिश की किंतु अधिक समय नहीं दे पाया इसलिये काफी unmetered है….. माफ़ीगुज़ार हूँ इसके लिये….

 
उन्हे पर कतरने का शौक़ है
यहाँ हवाओं से लड़ने का शौक़ है

रखो ये नफ़ासत अपने पास तुम
हमें तितलियां पकड़ने का शौक़ है

लोग ड़रते हैं ड़रें गिरने से यहाँ
हमें आसमां परखने का शौक़ है

लाख पहरे बिठा लो कुछ होगा नहीं
खुशबुओं को बिखरने का शौक़ है

वो लगे हैं हमको गिराने में सब
हमें तो आगे बढ़ने का शौक़ है

अंधेरों उजालों में उलझे हैं सब
हमें रंग भरने का शौक़ है

ये दिये ना बुझेंगे हवाओं से अब
हर हाल इन्हे जलने का शौक़ है

उन्हे शौक़ है महलों में बसें
हमें दिल में बसने का शौक़ है

 

रोहित जैन
24-04-2008

Published in: on अप्रैल 24, 2008 at 12:08 अपराह्न  Comments (5)  
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खींच लाएगी

ज़िंदगी पास खींच लाएगी
इक न इक आस खींच लाएगी

तुझे भी एक दिन इस कुँए तक
तेरी ही प्यास खींच लाएगी

दुआ दिल की कबूल जब होगी
मरते में साँस खींच लाएगी

हालात की तल्ख़ी देखना तुझको
ख़ुदा के पास खींच लाएगी

मेरी याद तुझे मुझ तक
करके उदास खींच लाएगी

मेरी मोहब्बत आवाज़ जब देगी
तुझे बदहवास खींच लाएगी

चमन तक तुझे भी इक दिन
गुलों की बास खींच लाएगी

‘रोहित’ की ग़ज़ल तक तुझको
बात कुछ खास खींच लाएगी
रोहित जैन
23-04-2008

Published in: on अप्रैल 23, 2008 at 10:52 पूर्वाह्न  Comments (1)  
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अहलेमोहब्बत

कोई हमें भाता नहीं उस मेहरबां को छोड़कर
और कुछ मिलता नहीं उससे फ़ुगां को छोड़कर

अपनी अपनी है तमन्ना, अपनी अपनी है दुआ
चुन लिया हमने उसे सारे जहां को छोड़कर

ऐसा नहीं कोई भी छत, कोई भी दर हासिल नहीं
हमको जाना ही नहीं उसके मकां को छोड़कर

ये ख़लिश कैसी जगी है, है ये कैसी आरज़ू 
और कुछ बाकी नहीं दिलेनातवां को छोड़कर

क्या लिखें ख़त में तुझे, क्या कहें लब खोलकर
कोई ज़बां आती नहीं दिल की ज़बां को छोड़कर

है ‘रोहित’ अहलेमोहब्बत कोई शक़ इसमें नहीं
मर के जाएगा कहां इस आस्तां को छोड़कर

रोहित जैन
21-04-2008

 

फ़ुगां = Cry of Pain

दिलेनातवां = Weak Heart

आज तक जो भी हुआ प्रस्तावना है

आपको अब भी बहुत कुछ देखना है
आज तक जो भी हुआ प्रस्तावना है

चाँद तक जाने की राहें खोज लीं
दिल से दिल की राह किसको ढ़ूंढ़ना है

अब भी तुमको आस है क्या बात है
तुम भी पागल हो यही संभावना है

तुम शराफ़त से कराओगे ये काम
ये तो नियमों की कड़ी अवमानना है

टूट कर बिखरोगे अड़ियल ना बनो
जानते भी हो के किससे सामना है

लो नये नेताजी आते हैं यहाँ
हाथ में वादों का उनके झुनझुना है

कुछ तो सोचो कुछ विचारो यार तुम
अम्न-ए-आलम ये भी कोई कामना है

आप भी निकलें ज़रा ख़्वाबों से अब
आप का घर भी हवाओं में बना है

मै यूँ ही दहलीज़ पे बैठा हूं अब
क्या बला है ये सहर ये देखना है

 

रोहित जैन
18-04-2008

और नहीं

मरने की दुआ दे दो हमको जीने का तमाशा और नहीं
इस रंज मुसीबत ग़म से भरी दुनिया की तमन्ना और नहीं

साहिल पे अड़े तूफ़ानों के सहता हूं थपेड़े मुद्दत से
अब हार गया हूं दुनिया से कश्ती ये शिकस्ता और नहीं

अश्क़ गिराये थे हमने के दिल की आग बुझायेंगे
आग नई इन अश्क़ों से हर बार लगाना और नहीं

दुनिया समझी है हमको और हम भी समझ गए दुनिया
अब दानिशमंदी कहती है के दुनिया दुनिया और नहीं

दिल के टुकड़ों को हौले से अब जोड़ा है, समझाया है
अब ग़म तो क्या ज़िक्रेग़म भी इस दिल को गंवारा और नहीं

था चाक जिगर मोहताजेरफ़ू मुश्किल से छुपे हैं छेद सभी
अब ठानी है हमने दिल में ये शौकेबहारां और नहीं

हम क़त्ल हुए हैं पहले ही इक बार नहीं सौ बार यहां
अश्क़ों की ज़बां से आती उन आहों का इशारा और नहीं

आहें देखीं रुसवाई भी अश्क़ों से भरी तन्हाई भी
सब देख चुका हूं दुनिया में इक और नज़ारा और नहीं

उस दिन के लिये ‘रोहित’ सह ली ज़ुल्मत सारी इस दुनिया की
जो होना हो अब हो जाये, अब ख़ौफ़-ए-ख़ुदाया और नहीं
रोहित जैन
16-04-2008

Published in: on अप्रैल 16, 2008 at 3:20 अपराह्न  Comments (1)  
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कोई मुग़ालता तो नहीं

देख आऊं वो गिरा खून कहीं मेरा तो नहीं
मेरी ही लाश सजी हो कहीं ऐसा तो नहीं

टूट ही जाते हैं ख़्वाब, साँस और उम्मीदें
सोचता हूं मुझे भी इनपे भरोसा तो नहीं

तबस्सुम सोचती रहती है हमेशा वो रहे
कहीं आपको भी ऐसी ही तमन्ना तो नहीं

मौसमी बर्फ़ हैं रिश्ते, ये पिघल जायेंगे
इन्ही शाखों पे आपका भी बसेरा तो नहीं

बोझ अश्कों का उठाएगी कई पुश्त ज़मीं
देखिये आप से कोई कहीं रुसवा तो नहीं

करूंगा याद मै हर बात जो बीती मुझ पर
फिर मै देखूंगा कहीं ज़ख़्म वो ताज़ा तो नहीं

उसे तो शौक है यारों के वो दिल से खेले
आपके दिल में भी ऐसा कोई जज़्बा तो नहीं

नशा कैसा भी हो इक रोज़ उतर जायेगा
‘रोहित’ तुम्हे भी कोई मुग़ालता तो नहीं
रोहित जैन
15-04-2008