ज़िंदगी अपनी

लो कर दी पेश हमने ये मज़ाके ज़िंदगी अपनी
हँसें वो भी ज़रा खुलकर जो देखें ज़िंदगी अपनी

मसर्रत का ज़िकर करते ही मौत आती है धमकाने
उठाने यार आते हैं जनाज़े, ज़िंदगी अपनी

कभी सोचेंगे किस गलती की हमने ये सज़ा पाई
के आहें बन गईं हैं अब मिजाज़े ज़िंदगी अपनी

कभी खेले हैं हम इस से, कभी इसको उड़ाया है
जो आई नींद तो सोए बिछाके ज़िंदगी अपनी

वो क्या रिश्ते थे, मेरे यार थे माशूक़ थे क्या थे?
जिन्होने तोड़ ड़ाली है ये ख्वाबे ज़िंदगी अपनी

मेरी मजबूरियों का तुम नहीं रखते हो अंदाज़ा
नहीं पूछो कहाँ आया बिताके ज़िंदगी अपनी

जो अपनों का शहर था हाल उसका हो गया है ये
बड़ी दिक़्क़त से आए हैं बचाके ज़िंदगी अपनी

जो कहता हूँ संभल जाओ तो मानो बात मेरी तुम
सबक पाए हैं मैने आज़माके ज़िंदगी अपनी

बहुत रोया भी, तड़पा भी, ग़मों से छटपटाया भी
बड़ी नेमत मिलीं तुम पर लुटाके ज़िंदगी अपनी

करी कितनी इबादत, मन्नतें रक्खीं, दुआ मांगीं
नहीं आई मगर अब तक ठिकाने ज़िंदगी अपनी

उसे देखा तो पहचाना नहीं और आईना बोला
कहाँ रख दी है ‘रोहित’ ने चुराके ज़िंदगी अपनी

रोहित जैन
23-05-2011

परिन्दे

कैसी उड़ान में हैं ये ख़्वाबों के परिन्दे
ख़्वाहिश के आसमां में अज़ाबों के परिन्दे

शाखों पे मेरे दर्द की बैठे हैं सब के सब
उड़ के जो आए थे तेरी यादों के परिन्दे

कब तक रखेंगे क़ैद इन्हें आप जिस्म में
छूटेंगे किसी रोज़ तो साँसों के परिन्दे

छुप जाएगी वो रोशनी, हिल जाएगा वो अर्श
ग़मेदिल से रिहा होंगे जो आहों के परिन्दे

टुकड़े बिखेरते चले हम दिल के हर तरफ़
हमको दुआएं देते हैं राहों के परिन्दे

‘रोहित’ किसी के दिल को पढ़ेगा तो किस तरह
चेहरे को ढ़क रहे हैं नक़ाबों के परिन्दे

रोहित जैन
01-04-2011

Published in: on अप्रैल 4, 2011 at 5:33 अपराह्न  Comments (5)  
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वो मेरा था मगर मेरा कहां था

उफ़क़ को देखकर ऐसा गुमां था
ज़मीं की दोस्ती में आसमां था

कोई उलझन नहीं थी इस से बढ़कर
वो मेरा था मगर मेरा कहां था

हुनर ही था, इसे क्या और कहिये
बड़ी तहज़ीब से नामेहरबां था

ज़मीर आया मेरी आँखों के आगे
वगरना मै भी उसका राज़दां था

यकीं तो था मुझे पर कुछ कमी थी
अजब सा फ़ासिला इक दर्मियां था

ख़ता थी, हाँ ख़ता ही थी वो मेरी
मुझे था प्यार और बेइन्तिहां था

ज़हन अहमक़ ज़बां नादां थी उसकी
मगर दिल से बुरा ‘रोहित’ कहां था

रोहित जैन
07-03-2011

उफ़क़ – Horizon
नामेहरबां – Rude
वगरना – Otherwise
अहमक़ – Foolish/Immature

रिश्ता

कैसे रिश्ते खत्म किये जाते हैं मेरे यार सिखा दे
कैसे भूल गया तू मेरा प्यार सिखा दे
मै तो अब तक भूल नहीं पाता हूँ तुझको
अपने ख़्वाबों, यादों में पाता हूँ तुझको
तेरे जैसा मेरा कोई और नहीं था
दूर भी था मुझसे और मुझसे दूर नहीं था
कैसे दिल की बातें सब कर लेते थे हम
इक दूजे को यार सलाहें देते थे हम
सारे ड़र, सारी खुशियां और सारे ही ग़म
कैसे बांट लिया करते थे यार मेरे हम
औरों से भी पूछने जो होते थे हमको
इक दूजे से पूछ लिया करते थे उनको
कैसे हल हो जाते थे सवाल वो सारे
कैसे भूल गया तू माह-ओ-साल वो सारे
पहले जब इक दिन भी बात नहीं होती थी
चैन का दिन और चैन की रात नहीं होती थी
रातें जगकर, सब बातों से वक़्त बचाकर
चैन मिला करता था दिल का हाल सुनाकर
छोटी छोटी बातें भी कहनी होती थीं
इक दूजे के ड़ांटें भी सहनी होती थीं
कितना फ़ख़्र किया करते थे इक दूजे पर
और ऐतबार किया करते थे इक दूजे पर
दुनिया को मिसाल देते थे अपनी यारी की
सबसे कहते थे दूजे की दिलदारी की
दिल का रिश्ता था लोगों की समझ से आगे
इख़लास का रिश्ता था दुनिया की पहुंच से आगे

जाने किस की नज़र लगी है इस रिश्ते को?

रोहित जैन
11-02-2011

शायद

दिल मेरा बेज़ुबान है शायद
फ़ासिला दर्मियान है शायद

उसने बोला है भूल जाऊं उसे
काम इतना आसान है शायद

ड़ूबते दिल की शाम ऐसी है
जल रहा आसमान है शायद

7-2-2011

हमपे सारे सितम नहीं गुज़रे
वो ख़ुदा मेहरबान है शायद

फ़क़त उनकी ही चाह है दिल को
कोई बच्चा नादान है शायद

लब सिले हैं तो कौन रोता है
ज़ख़्म की भी ज़बान है शायद

हिज्र की बात पे वो चुप से हैं
इक बड़ी दास्तान है शायद

मै बुरा हूं ये तेरे लब्ज़ नहीं
दुश्मनों का बयान है शायद

इश्क़ में क्यों मुझे ये लगता है
ये कोई इम्तिहान है शायद

ज़िंदगी रुक गई है अब ‘रोहित’
उम्र भर की थकान है शायद

रोहित जैन
9-2-2011

Published in: on फ़रवरी 9, 2011 at 7:26 पूर्वाह्न  Comments (3)  
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