रिश्ता

कैसे रिश्ते खत्म किये जाते हैं मेरे यार सिखा दे
कैसे भूल गया तू मेरा प्यार सिखा दे
मै तो अब तक भूल नहीं पाता हूँ तुझको
अपने ख़्वाबों, यादों में पाता हूँ तुझको
तेरे जैसा मेरा कोई और नहीं था
दूर भी था मुझसे और मुझसे दूर नहीं था
कैसे दिल की बातें सब कर लेते थे हम
इक दूजे को यार सलाहें देते थे हम
सारे ड़र, सारी खुशियां और सारे ही ग़म
कैसे बांट लिया करते थे यार मेरे हम
औरों से भी पूछने जो होते थे हमको
इक दूजे से पूछ लिया करते थे उनको
कैसे हल हो जाते थे सवाल वो सारे
कैसे भूल गया तू माह-ओ-साल वो सारे
पहले जब इक दिन भी बात नहीं होती थी
चैन का दिन और चैन की रात नहीं होती थी
रातें जगकर, सब बातों से वक़्त बचाकर
चैन मिला करता था दिल का हाल सुनाकर
छोटी छोटी बातें भी कहनी होती थीं
इक दूजे के ड़ांटें भी सहनी होती थीं
कितना फ़ख़्र किया करते थे इक दूजे पर
और ऐतबार किया करते थे इक दूजे पर
दुनिया को मिसाल देते थे अपनी यारी की
सबसे कहते थे दूजे की दिलदारी की
दिल का रिश्ता था लोगों की समझ से आगे
इख़लास का रिश्ता था दुनिया की पहुंच से आगे

जाने किस की नज़र लगी है इस रिश्ते को?

रोहित जैन
11-02-2011

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क्या बात है?

कुछ दिन पहले कृष्ण बिहारी ‘नूर’ साहब का एक शेर पढ़ा.

क्या बताएं क्या अज़ीम उसकी ज़ात है
सागर को सीपियों से उलचने की बात है

इसके मिसरा-ए-ऊला से प्रेरणा ले के एक मतला लिखा और फिर एक ग़ज़ल कहने की कोशिश की है…

आपकी अमूल्य टिप्पणी का मुन्तज़िर हूँ…

तुम इश्क को मेरे परखते हो? क्या बात है?
सागर को सीपियों से उलचते हो? क्या बात है?

जब जानते हो खून तो ताजा ही आएगा
तुम ज़ख्म को अपने खुरचते हो? क्या बात है?

महकते थे बहकते थे मचलते थे संभलते थे
सिसकते हो सुबकते हो? क्या बात है?

26-11-2010

वो बेवफ़ा था, और ये कह भी गया कम्बक़्त वो
तुम उसी की राह तकते हो? क्या बात है?

एक ही मुश्किल है के मुश्किल बहुत है भूलना
पर याद तुम दिन रात करते हो? क्या बात है?

जिस मोड़ से रहने की दूर तुम कसम खा आए थे
उस मोड़ पर अब भी ठहरते हो? क्या बात है?

एक ज़माने में जिन्हे तुम ही ने समझाया था इश्क़
इश्क़ अब उनसे समझते हो? क्या बात है?

आँख की गहराइयों में, दिल के अंधियारों के बीच
यूँ शमा बनकर पिघलते हो? क्या बात है?

दिल गया तो आँख को कैसा दिया है काम ये
बस वही तस्वीर तकते हो? क्या बात है?

तुमने ‘रोहित’ से कहा था इश्क़ ग़म का नाम है
बात से अपनी पलटते हो? क्या बात है?

14-12-2010

Published in: on दिसम्बर 14, 2010 at 2:52 अपराह्न  Comments (4)  
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दिल रहता है भरा भरा

गुलज़ार साहब की ग़ज़ल से काफ़िया चुराने की गुस्ताखी कर रहा हूँ, उम्मीद है आप इसके लिये मुझे माफ़ करेंगे…

गलती ही की जो सब बोला खरा खरा
क्या बोलूं अब मै हूँ कितना ड़रा ड़रा

कुछ तो तबियत यारों अपनी नाज़ुक है
और जिगर का ज़ख़्म भी तो है हरा हरा

जब से तूने खाली खाली बातें कीं
तब से मेरा दिल रहता है भरा भरा

चेहरे का बिस्तर भी सिलवट सिलवट है
ज़ीस्त का दफ़्तर भी बिखरा है ज़रा ज़रा

इश्क़, रफ़ाक़त, रिश्ते, पैसा, जागीरें
सब रह जाएगा ऐसे ही धरा धरा

ऐसा क्या बोला ‘रोहित’ इस दुनिया से
जो इन की नज़रों में तू है मरा मरा

रोहित जैन
31-08-2010

वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है

वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है
बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है

वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम हंसे थे इत्तेफ़ाक़न
अब यूं हुआ के सावन आँखों में आ बसा है

काफ़ी थे चंद लम्हे तेरे साथ के सितमगर
ये क्या किया है तूने ख़्वाबों में आ बसा है

अब तो वो ही है साहिल, तूफ़ान भी वो ही है
कुछ इस तरह से दिल की मौजों में आ बसा है

उम्मीद-ओ-हौंसला भी, रिश्ता भी है, ख़ला भी
वो ज़िंदगी के सारे नामों में आ बसा है

कुछ रफ़्ता रफ़्ता आता, मुझको पता तो चलता
वो शख़्स एक दम ही आहों में आ बसा है

उस की पहुंच गज़ब है, वो देखो किस तरह से
दिन में भी आ बसा है रातों में आ बसा है

क्या बोलता हूं ‘रोहित’, के पूछती है दुनिया
वो कौन है जो तेरी बातों में आ बसा है

रोहित जैन
08-02-2008

जिस्म के नेज़े पे जो रखा हुआ है

जिस्म के नेज़े पे जो रखा हुआ है
एक तमगा है जो बस लटका हुआ है

शहर में कैसा मचा है हंगामा
आज किसका दिल यहां रुसवा हुआ है

आप ही बुत जोड़ने को कह रहे हैं
आपके हाथों से जो तोड़ा हुआ है

ये अचानक आँच आई है कहां से
शोला-ए-दिल कौन सा भड़का हुआ है

आपको भी खुश नज़र मै आ रहा हूँ
आपकी आँखों को भी धोखा हुआ है

पूछते हो क्यों करी हैं बंद आँखें
एक दरिया अश्क़ का रोका हुआ है

चीखती तन्हाइयों की सर्द आहें
कैसा है ये शोर जो बरपा हुआ है

उसकी हर इक ज़िद मुझे करनी है पूरी
मै बड़ा हूँ और वो बच्चा हुआ है

एक पल उनको लगा तर्क़े वफ़ा में
एक पल में क्या कहूँ क्या क्या हुआ है

जिन पलों को याद कर मै जी रहा हूँ
वो ही हर पल बस उन्हे भूला हुआ है

मेरी रुसवाई पे क्यों हँसते हो ‘रोहित’
आपके भी नाम का चर्चा हुआ है

रोहित जैन
22-7-2010

यूँ इश्क़ का हमने दिया है इम्तिहां अक़्सर

यूँ इश्क़ का हमने दिया है इम्तिहां अक़्सर
मुँह में ज़ुबां होते हुए थे बेज़ुबां अक़्सर

इश्क़ की तासीर ये समझा नहीं कोई
इश्क़ में मिट जाते हैं नाम-ओ-निशां अक़्सर

अश्क़ बिखर जाते हैं बरसात का पानी बनकर
खुशी के पल बन जाते हैं दर्द-ओ-फ़ुगां अक़्सर

इश्क़ की नीली सियाही वक़्त के पीले से कुछ हर्फ़
ज़िंदगी खो जाती है इन ही के दर्मियां अक़्सर

उसने परेशां कर लिया हमको बना के आईना
अपने होने का होता रहा फिर हमको गुमां अक़्सर

सुबह का वक्त ज़ेहन में धुंधला देता है इन्हे
हर शम्मा को यही अंजाम देता है जहां अक़्सर

हम तो जिनको चाहते थे बस नज़र के शौक़ से
वो शख़्स बन जाते हैं हाय दिल-ओ-जां अक़्सर

होंठ वो हिलते नहीं हाल-ए-दिल की बात पर
आँखों से ही होते हैं ये हुस्न-ए-बयां अक़्सर

हक़ीक़त है ही कुछ ऐसी के बयां कर नहीं सकते
तन्हाई को ही करना पड़ता है राज़दां अक़्सर

रोहित जैन
24/10/2007

मेरे वजूद को यूँ तेरे काम आना है

मेरे वजूद को यूँ तेरे काम आना है
जिगर का लख़्त लख़्त होंठ पर सजाना है

न जाने क्या कहा है शम्अ ने परवाने से
के अब उसे तो जल के ख़ाक ही हो जाना है

जो तूने कह दिया तो तर्क़ेमोहब्ब्त कर ली
जज़ा में अब भले ही हमको दिल जलाना है

तलाशेयार ने मुझको किया कहाँ से कहाँ
चले थे सोच के कि ज़िंदगी को पाना है

मुझे भी होने लगी अब तो चाह जन्नत की
मुझे भी ये फ़रेब आसमाँ का खाना है

मुझे तो प्यार है उदूं के इरादों से भी अब
तेरी उल्फ़त में भला लग रहा ज़माना है

मेरा चिराग़ तो कब का ये बुझ गया था मगर
तेरी निस्बत में इसे राह पर सजाना है

बुला रहे हैं मुझे मैक़दा भी मस्जिद भी
कहीं भी जाऊँ वहाँ तेरा अक्स पाना है

उफ़क़ से संगेआफ़ताब ज्यों ही आयेगा
हर एक रात को टुकड़ों में बिखर जाना है

जो वक़्त यूँ तो रेंगता है मेरी साँसों में
जो तेरा साथ हो तो पल में गुज़र जाना है

न जाने कब ये कटे पाप, हो सेहर ‘रोहित’
तुझे भी यूँ ही तब तलक तो जिये जाना है

रोहित जैन
17-12-2008

कोई सूरज हमारी ताक में है

पसेज़ुल्मत कोई सूरज हमारी ताक में है
इसी उम्मीद का दम अब हमारी ख़ाक में है

नहीं है ख़ौफ़ किसी ज़ुल्म का हमें यारों
आओ देखें के जिगर कितना उस सफ़्फ़ाक में है

जो बदलती है रवानी तो बदल ले कौसर
रुख़ बदलने का हुनर आपके तैराक में है

वजूद अब भी सलामत है जान लो प्यारे
तो क्या हुआ के लिबासेबदन ये चाक में है

बुलंद कितनी भी स्याही फ़रेब की हो यहाँ
इसे पढ़ने का तजुर्बा दिलेख़ाशाक में है

उन्हे हैरत है ग़मेज़िंदगी से खुश हूँ मै
मज़ा अलग ही मिंया दर्द की खुराक में है

ना बुरा मानिये ‘रोहित’ की किसी बात का आप
हज़ार दर्द दिलेबेचारा-ए-बेबाक में है

रोहित जैन
26-11-2008

पसेज़ुल्मत == Beyond the Darkness
सफ़्फ़ाक == Cruel
कौसर == River of Heaven
दिलेख़ाशाक == Destroyed Heart

मिजाज़ेज़िंदगी है काफ़िराना

मिजाज़ेज़िंदगी है काफ़िराना
कभी बातों में इसकी तुम न आना

कभी होता था मै भी आशिक़ाना
हुआ क्या के हुआ सब मर्सियाना

ज़िंदगी क्या है मुझसे पूछ्ते हो
साँस लेने का छोटा सा बहाना

ये शाखेदिल बड़ी नाज़ुक है लोगों
बनाओगे कहां तुम आशियाना

नज़र में तो अलग सा ही बयां है
कहां सीखा है ये बातें बनाना

मुझे मालूम है मेरी कमी है
नहीं आता मुझे दिल का दुखाना

बड़ी ख़ुशरंग है आबोहवाएं
करो तबियत को तुम भी आशिक़ना

मै नज़रें ना मिला पाया किसी से
जब उसने चाहा मुझको आज़माना

वो मुझको देखते हैं आज ऐसे
के जैसे शक़्ल ही हो मुजरिमाना

उलझकर रह गया है ज़िंदगी में
ये ‘रोहित’ था कभी जो शायराना

रोहित जैन
29-08-2008

सुना है अफ़साना

इशरत का सुना है अफ़साना हैरत का सुना है अफ़साना
चाँद सितारों से तेरी सूरत का सुना है अफ़साना

लोगों ने सुने हैं वाइज़ से किताबी क़यामत के किस्से
हमने तेरी निगाहों की राहत का सुना है अफ़साना

तू घबराई तू शरमाई जो हमको तकते देख लिया
आँखों ने जो कर दी उस जुर्रत का सुना है अफ़साना

ख़ारों से गुल्ज़ारों का और खिज़ा से खिली बहारों का
दोज़ख के वाशिंदों से जन्नत का सुना है अफ़साना

नींदों में मीठे ख्वाबों का और साँसों के सैलाबों का
दिल में होनेवाली हर आहट का सुना है अफ़साना

वो लैला लैला करता था वो मजनू मजनू कहती थी
हम ने भी उन दोनों की उल्फ़त का सुना है अफ़साना

संग-सफ़ेद का टुकड़ा वो पैमान-ए-मोहब्बत है यारों
ताज-ए-मोहब्बत की हमने तुरबत का सुना है अफ़साना

रोहित जैन
16-01-2008

तुरबत = Tomb