शायद

दिल मेरा बेज़ुबान है शायद
फ़ासिला दर्मियान है शायद

उसने बोला है भूल जाऊं उसे
काम इतना आसान है शायद

ड़ूबते दिल की शाम ऐसी है
जल रहा आसमान है शायद

7-2-2011

हमपे सारे सितम नहीं गुज़रे
वो ख़ुदा मेहरबान है शायद

फ़क़त उनकी ही चाह है दिल को
कोई बच्चा नादान है शायद

लब सिले हैं तो कौन रोता है
ज़ख़्म की भी ज़बान है शायद

हिज्र की बात पे वो चुप से हैं
इक बड़ी दास्तान है शायद

मै बुरा हूं ये तेरे लब्ज़ नहीं
दुश्मनों का बयान है शायद

इश्क़ में क्यों मुझे ये लगता है
ये कोई इम्तिहान है शायद

ज़िंदगी रुक गई है अब ‘रोहित’
उम्र भर की थकान है शायद

रोहित जैन
9-2-2011

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Published in: on फ़रवरी 9, 2011 at 7:26 पूर्वाह्न  Comments (3)  
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शायद

हमारी इब्तेदा ही है हमारी इंतेहा शायद
मुसीबत में भी अब आने लगा हमको मज़ा शायद

मोहब्बत बन गई है जान-ओ-दिल का मस’अला शायद
के हम से आशना होता है वो नाआशना शायद

जो रातों को जगे रहना हुआ है मशग़ला शायद
मोहब्बत में हुआ करता है ये ही सिलसिला शायद

य़ही इक सोच लेके हम चले जाते हैं दुनिया से
हमारा भी कोई देखा करेगा रास्ता शायद

ख़ता पर ग़ौर तक न कर सकें उनसे ग़िला कैसा
कहीं किस्मत में ही अपने लिखी थी ये सज़ा शायद

नहीं ये आँधियां मासूम हैं इनसे ना कुछ बोलो
ख़ुद हम अपने ही हाथों से बुझा बैठे दिया शायद

सितम कितने किये हैं आप ने मज़लूम आशिक़ पर
वो फिर भी कर रहा है देखिये तो मरहबा शायद

जो करते हैं सितम हमपे ख़ुदा से मूंदकर आँखें
उन्हे भी याद आयेगा किसी दिन तो ख़ुदा शायद

लो अब तुम भी लगे हो मुस्कुराने देखकर हमको
तुम्हे भी अब समझ आने लगा है माजरा शायद

वही मय्यत में ‘रोहित’ की नहीं आयेंगे के जिनको
दिया करता था वो लम्बी उमर की बद्दुआ शायद

रोहित जैन
31-10-2008

मशग़ला – Preoccupation

Published in: on नवम्बर 17, 2008 at 11:07 अपराह्न  Comments (4)  
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