दिल रहता है भरा भरा

गुलज़ार साहब की ग़ज़ल से काफ़िया चुराने की गुस्ताखी कर रहा हूँ, उम्मीद है आप इसके लिये मुझे माफ़ करेंगे…

गलती ही की जो सब बोला खरा खरा
क्या बोलूं अब मै हूँ कितना ड़रा ड़रा

कुछ तो तबियत यारों अपनी नाज़ुक है
और जिगर का ज़ख़्म भी तो है हरा हरा

जब से तूने खाली खाली बातें कीं
तब से मेरा दिल रहता है भरा भरा

चेहरे का बिस्तर भी सिलवट सिलवट है
ज़ीस्त का दफ़्तर भी बिखरा है ज़रा ज़रा

इश्क़, रफ़ाक़त, रिश्ते, पैसा, जागीरें
सब रह जाएगा ऐसे ही धरा धरा

ऐसा क्या बोला ‘रोहित’ इस दुनिया से
जो इन की नज़रों में तू है मरा मरा

रोहित जैन
31-08-2010

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उसकी गली में देख तो मुझे आज मेरा पता मिला

उसकी गली में देख तो मुझे आज मेरा पता मिला
दैरोहरम भटका किया, दिलेबेख़बर में खुदा मिला

जिस मोड़ से मै बचा किया, जिस राह से रहा दूर दूर
उसी राह के उस मोड़ पर वो चराग़ लेके खड़ा मिला

क्या क्या जतन किया किये बचा के रखने को आशियां
वो ही आशियां जो सहर हुई तो आज मुझको जला मिला

जो रोशनी का पयाम था मेरे घर से तुम्हारे घर तलक
वही चाँद टहनी की आड़ में तेरी छत पे मुझको छुपा मिला

सौ जतन किये थे चाह में, कई फूल बिछाये थे राह में
कुछ भी ख़ता तो करी नहीं फिर आज क्यों वो ख़फ़ा मिला

जिसे भर रखा था ख़याल से, तेरी याद तेरे विसाल से
वो ख़्वाब था जो छलक गया, इक खाली जाम पड़ा मिला

मुझे याद भी नहीं था जो, वो दिखा तो मुझको पता चला
जो ढ़का था वक़्त की गर्द से वो रिश्ता कहीं से जुड़ा मिला

इक काफ़िला था गुज़र गया, आईने से चेहरा उतर गया
वो गुबार और वो चमक गई तो वो शख़्स मुझसे जुदा मिला

वो ही हैरतें वो ही हसरतें वो मोहब्बतों की नुमाइशें
मेरे नसीब में सिलसिला मुझे इन सभी का लिखा मिला
रोहित जैन
31-03-2007

मेरी ज़बां से मेरा ही अफ़साना बिखरा

मेरी ज़बां से मेरा ही अफ़साना बिखरा
ढ़ूँढ़ो कहां जाने ये दिल दीवाना बिखरा

नाकाम मै है इस से भी ग़ारत नहीं ग़म
टूटा जो दिल ये मेरा तो मैखाना बिखरा

जो था खुदा वो कितना है मायूस देखो
वो बिखरी मस्जिद ये बुतखाना बिखरा

किस सिम्त जाऊं ले कर मै ग़म-ए-दिल
बिखरा है हर अपना, हर बेगाना बिखरा

रोहित जैन
31-12-2007

वक़्त का मुसाफ़िर छीनकर सफ़हा मेरा ले जायेगा

वक़्त का मुसाफ़िर छीनकर सफ़हा मेरा ले जायेगा
वो इस ज़बाँ से उस ज़बाँ ये किस्सा ले जायेगा

दुआ माँगी तो थी लेकिन ये सोचा ना था
बारिश का मौसम मेरा घर बहा ले जायेगा

हमसफ़र आया, दो पल साथ चलकर चला गया
नहीं मालूम था वो साथ अपने रास्ता ले जायेगा

दिल का हाल सुनाया तो है, पर ये भी इल्म है
मेरे लब्ज़ों को चुरा वो हमज़बाँ ले जायेगा

रोहित जैन
28/02/2007