इश्क़ करो और गिने जाओ ख़राब में

ना जाने ये लिखा हुआ है किस किताब में
के इश्क़ करो और गिने जाओ ख़राब में

काँटों ने जब लहू से किया और सुर्ख़ उसे
तब जाके कहीं रंग आया है गुलाब में

चाहा तो था दिल को मिले सुकूं जवाब से
कितने सवाल आते हैं उनके जवाब में

मुझको तो शायद कश्तियां थीं ढ़ूंढ़नी
मै ही यां ड़ूबा हुआ हूं इक सैलाब में

है होश में वही जो मिला आप से हुज़ूर
बाकी सभी भटकते हैं अब तक सराब में

इक यां ही तो मुझे नसीब दीद-ए-यार है
बस एक यही बात तो अच्छी है ख़्वाब में

तूने नज़र उठाई ही क्यों मैक़दे की ओर
कोई मज़ा बाकी ही न रहा शराब में

न जाने तुझे बात याद कौन कौन है
मैने तो इश्क़ में रखा न कुछ हिसाब में

‘रोहित’ को भी ‘ग़ालिब’ की तरह जागना होगा
आने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में

रोहित जैन
01-09-2010

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वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है

वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है
बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है

वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम हंसे थे इत्तेफ़ाक़न
अब यूं हुआ के सावन आँखों में आ बसा है

काफ़ी थे चंद लम्हे तेरे साथ के सितमगर
ये क्या किया है तूने ख़्वाबों में आ बसा है

अब तो वो ही है साहिल, तूफ़ान भी वो ही है
कुछ इस तरह से दिल की मौजों में आ बसा है

उम्मीद-ओ-हौंसला भी, रिश्ता भी है, ख़ला भी
वो ज़िंदगी के सारे नामों में आ बसा है

कुछ रफ़्ता रफ़्ता आता, मुझको पता तो चलता
वो शख़्स एक दम ही आहों में आ बसा है

उस की पहुंच गज़ब है, वो देखो किस तरह से
दिन में भी आ बसा है रातों में आ बसा है

क्या बोलता हूं ‘रोहित’, के पूछती है दुनिया
वो कौन है जो तेरी बातों में आ बसा है

रोहित जैन
08-02-2008

कोई सूरज हमारी ताक में है

पसेज़ुल्मत कोई सूरज हमारी ताक में है
इसी उम्मीद का दम अब हमारी ख़ाक में है

नहीं है ख़ौफ़ किसी ज़ुल्म का हमें यारों
आओ देखें के जिगर कितना उस सफ़्फ़ाक में है

जो बदलती है रवानी तो बदल ले कौसर
रुख़ बदलने का हुनर आपके तैराक में है

वजूद अब भी सलामत है जान लो प्यारे
तो क्या हुआ के लिबासेबदन ये चाक में है

बुलंद कितनी भी स्याही फ़रेब की हो यहाँ
इसे पढ़ने का तजुर्बा दिलेख़ाशाक में है

उन्हे हैरत है ग़मेज़िंदगी से खुश हूँ मै
मज़ा अलग ही मिंया दर्द की खुराक में है

ना बुरा मानिये ‘रोहित’ की किसी बात का आप
हज़ार दर्द दिलेबेचारा-ए-बेबाक में है

रोहित जैन
26-11-2008

पसेज़ुल्मत == Beyond the Darkness
सफ़्फ़ाक == Cruel
कौसर == River of Heaven
दिलेख़ाशाक == Destroyed Heart

आ तेरे प्यार में तामीर करूँ ताजमहल

Inspired by a nazm by Azmal Sultanpuri sahab…

मै बनूं शाहजहां तू मेरी मुमताज़ महल
आ तेरे प्यार में तामीर करूँ ताजमहल

तू ही उर्दू का अदब और तू ही शेर-ओ-सुख़न
तू ही है गीत-ओ-रुबाई-ओ-क़ता हम्द-ए-ज़हन
तू ही है शेर का अशआर तू मफ़हूम-ए-नज़्म
तू ही महफ़िल तू ही शम्मा तू मोहब्बत की बज़्म
मै बनूं ‘मीर’-ओ-‘ग़ालिब’ तू बने मेरी ग़ज़ल
आ तेरे प्यार में तामीर करूँ ताजमहल

तू चमेली तू ही चम्पा तू गुलाब-ओ-गुलनार
तू ही नरगिस तू ही शहनाज़-ओ-हिना हरसिंगार
रातरानी भी तू ही और तू जूही की कली
मोगरे की तू ही ख़ुशबू तू मोतिये की हँसी
मै बनूं एक चमन तू हो मेरा फूल कँवल
आ तेरे प्यार में तामीर करूँ ताजमहल

तू ही लैला तू ही शीरीं तू ही हो हीर मेरी
क़ैस-ओ-फ़रहाद-ओ-राँझे सी हो तस्वीर मेरी
तू ही सोहनी का हो चेहरा मै ही महिवाल तेरा
तू ही हो श्याम की राधा मै ही गोपाल तेरा
मै बनूं राम तू बन जाये सिया का आँचल
आ तेरे प्यार में तामीर करूँ ताजमहल

तू वो जुगनू है के सूरज भी जिस से शरमाये
तू वो तितली है जो ख़ुशरंग फ़िज़ा कर जाये
तू ही वो हश्र है चश्म-ए-ग़ज़ाल हैं जिस से
अन्दलीबों कि हँसी तेरी सदा के किस्से
तू ही बुलबुल तू ही है चकोर पपीहा कोयल
आ तेरे प्यार में तामीर करूँ ताजमहल

तू ही मौसम तू ही वादी तू बहार-ए-गुलशन
तू ही पतझड़ तू ही बरखा तू ही सर्दी की चुभन
तू ही झरना तू ही नदिया तू ही सागर की लहर
तू ही चंदा तू ही सूरज तू ही तारों का शहर
तू ही बिजली तू ही पानी तू हवा ये बेकल
आ तेरे प्यार में तामीर करूँ ताजमहल

रोहित जैन
22-23/12/2008

तामीर = Plan
सुख़न = Poetry
रुबाई, क़ता, क़ता, हम्द = Forms of Urdu Poetry
अशआर = Couplet
मफ़हूम = Meaning / Essence
चमेली,चम्पा, गुलाब, गुलनार, नरगिस, शहनाज़, हिना, हरसिंगार, रातरानी, जूही, मोगरा, मोतिया, कँवल = Types of Flowers
हश्र = Limit
चश्म-ए-ग़ज़ाल = Eyes of Deer
अन्दलीब = Nightingale
चकोर, पपीहा, कोयल = Types of Birds

मोहब्बत में

कुछ ऐसे इश्क़ का धोखा मिँया खाया मोहब्बत में
पराया जुर्म अपने नाम लिखवाया मोहब्बत में

ये मेरा पैर मेरे बस में कब आया मोहब्बत में
नहीं गुमराह होकर राह पा पाया मोहब्बत में

जुनूं जागा जो उसको पा के जब अपना बनाने का
हर इक चादर से बाहर पाँव फैलाया मोहब्बत में

उसे खोकर भटकता हूँ मै बहरेज़िंदगी में अब
बताओ कौन तन्हा पार जा पाया मोहब्बत में

ये मत पूछो के हमको क्या मिला राहेमोहब्बत पर
पिये आँसू हैं हमने और ग़म खाया मोहब्बत में

ज़माने भर में है रुसवा तो इसमें फ़र्क़ ही क्या है
हुआ बदनाम तो क्या नाम तो पाया मोहब्बत में

नहीं हैं वो मगर इक याद तो है साथ में अपने
कम-अज़-कम इतना तो ‘रोहित’ ने कमाया मोहब्बत में

रोहित जैन
21-11-2008

Published in: on नवम्बर 26, 2008 at 10:32 पूर्वाह्न  Comments (1)  
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सोज़ेदिल में कभी कमी ना हो

सोज़ेदिल में कभी कमी ना हो
ज़िंदगी चाहे ज़िंदगी ना हो

वो मुझे देखते हैं कुछ ऐसे
उनकी आँखों में गो नमी ना हो

राख को भी टटोलकर देखो
आग शायद अभी बुझी ना हो

पूछकर फिर से देख लो तो कहीं
तर्क़ेमोहब्बत दिल्लगी ना हो

आवाज़ वो आती नहीं खुलकर
जो कभी जानेमन दबी ना हो

मैने माना के जी लूंगा तुझ बिन
हाय पर हाल ये कभी ना हो

दुनिया कहती है वो नहीं मेरे
या ख़ुदा बात ये सही ना हो

मै नहीं मानता के उस दिल में
एहसास मेरे वास्ते कहीं ना हो

बस के ‘रोहित’ बहुत हुआ ज़ालिम
दर्द-अफ़्शां ग़ज़लकही ना हो

रोहित जैन
08-11-08

और भी काम हैं ज़माने में

बहुत दिनों से ग़ैरहाज़िर हूँ जिसके लिये माफ़ीगुज़ार हूँ. अपनी हालत बयां करने के लिये एक फ़ैज़ साहब का शेर अर्ज़ कर रहा हूँ –

दुनिया ने तेरी याद से बेग़ाना कर दिया
तुझसे भी दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के

एक नई ग़ज़ल लिखी है पेशेख़िद्मत कर रह हूँ…

नाम बदनाम है ज़माने में
हाय क्या रंग है फ़साने में

जिसको भूला वो एक पल में यहां
किया वो इश्क़ था ज़माने में

हम तो पहुँचे थे वक़्त पर लोगों
लगा उसे ही वक़्त आने में

उससे पूछो के जिस पे गुज़रा है
किस्सा आसां है जो सुनाने में

मुझको हर बार यकीं होता है
गज़ब अंदाज़ हर बहाने में

जो हमेशा से कहीं क़ायम था
लगे हैं उसको आज़्माने में

वो भटकता था इश्क़ का मारा
होश आये हैं अब ठिकाने में

जलनेवाला तो फ़ना था शायद
किसने दी है ख़बर ज़माने में

हाथ ख़ारों से भर गये मेरे
फूल इक ज़ुल्फ़ में सजाने में

सारी दुनिया ही लुट गई मेरी
उसको अपना ख़ुदा बनाने में

पनाह हसरतों में ढ़ूंढ़ते थे
लगे थे हम भी सर छुपाने में

कितना मजबूर हो गया था कभी
उसे मै हाल-ए-दिल सुनाने में

ज़ख़्म-ए-दिल से ही रोशनी है यहां
दिया यही है आशियाने में

बस यही सोचकर के मै चुप ही रहा
तेरा भी ज़िक़्र है फ़साने में

साँस हो ख़वाब हो या हो हस्ती
वक़्त लगता नहीं है जाने में

ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था वजूद
चंद टुकड़े खुशी के पाने में

वक़्त कितना लगा था बसने में
लगा था पल ही बस जलाने में

हम भी खुश हैं, नहीं है कोई भी ग़म
लगे थे हम भी ये दिखाने में

बख़्श दे ऐ ख़ुदा तू ‘रोहित’ को
और भी काम हैं ज़माने में

रोहित जैन
08-09-2008

ना मंदिरों में पायेगा ना मस्जिदों में पायेगा

ना मंदिरों में पायेगा ना मस्जिदों में पायेगा
ढ़ूंढ़ना है जो ख़ुदा तो ग़मज़दों में पायेगा

जब उस ख़ुदा ने अर्श को और फ़र्श को बांटा नहीं
फिर चैन कैसे आदमी इन सरहदों में पायेगा

घर में जाके देख तो बच्चे हैं कुछ भूखे वहां
य़े बता दे फिर खुशी क्या मैकदों में पायेगा

ना ही किसी की भीख से ना रहम से रख वास्ता
जो भी तुझको चाहिये वो मक़सदों में पायेगा

ढ़ूंढ़ता जिसको है तू वो ज़ुल्फ़ के बस में नहीं
छांव तुझको चाहिये तो बरगदों में पायेगा

आसमां छूना है तो फैला के पर उड़ जा अभी
पाना है तुझको मंज़िलें तो ना हदों में पायेगा

जो यहीं बिखरा हुआ है तेरे मेरे आस पास
वो ही किताबों में वो ही तू बुतकदों में पायेगा

जो दफ़्न है अंदर उसे ना भूलना प्यारे कभी
दम हुआ जो नींव में तो गुम्बदों में पायेगा

रोहित जैन
01-10-2007

उस इम्तिहान के पल में हम क्या कहें के झिझक गए

मेरे अश्क़ेनामुराद यूं, निगाह से थे छलक गए
चरागेदिल को बुझा गए, ये आज ऐसे चमक गए

हमें प्यास थी दीदार की, हो जाए झलक रुख़ेयार की
जिस पल गिरा उनका नक़ाब, उसी पल में पलकें झपक गए

मिलके भी तो हम ना मिले, थे दर्मियां कई फ़ासले
और वहशतेइश्क़ में, हम राह अपनी भटक गए

जो उन से मिली मेरी नज़र, उतरी बची सारी कसर
चले थे गुल की तलाश में, और ख़ार में हम अटक गए

शाखेज़हन की कली कली, महकी थी उसके ख़याल से
वो तस्सवुरेजाना किया, हम डाली डाली लचक गए

मुझे इश्क़ बेशुमार था, उसे भी कहां इनकार था
उस इम्तिहान के पल में हम क्या कहें के झिझक गए

रोहित जैन
31-03-2008

खतरे में है

कोई नहीं ये जानता के वो कब खतरे में है
ज़िंदगी जीने का देखो हर सबब खतरे में है

कोई यहां मंदिर को तोड़े, कोई ढ़ाए मस्जिदें
क्या ज़माना आ गया है अब तो रब खतरे में है

सोचते थे के यहां कानून है, बच जायेंगे
एक थी उम्मीद लेकिन वो भी अब खतरे में है

अब किसी की आँख में हैं चैन की नींदें कहां
दिन भी खतरों से भरा था और शब खतरे में है

वो शरीक-ए-जुर्म है तो फ़िक़्र वो फिर क्यों करे
जिसकी कोई ख़ता नहीं वो बेसबब खतरे में है

अब सभी को नाम लेकर सब बुलाते हैं यहां
बदले ज़माने में पुराना हर अदब खतरे में है

क्या रखें उम्मीद अब हम यार-रिश्तेदार से
क्या मदद उस से मिलेगी वो ही जब खतरे में है
रोहित जैन
23-03-2008

Published in: on मार्च 24, 2008 at 11:59 पूर्वाह्न  Comments (3)  
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