गलती ही थी अदाकारी नहीं की

गलती ही थी अदाकारी नहीं की
तभी तो किसी से भी यारी नहीं की

ख़फ़ा मुझसे होने लगा है ज़माना
उसूलों से मैने गद्दारी नहीं की

बिकता अगर मै तो मौके बहुत थे
ज़मीर की फ़ितरत बाज़ारी नहीं की

गलत बात थी इसलिये लड़ पड़ा था
ख़ता कोई ऐसी तो भारी नहीं की

अकेला ही था मै जहां के मुक़ाबिल
किसी ने मेरी ग़मगुसारी नहीं की

वही बात बोली जो रखी ज़हन में
सच-ओ-झूठ की पर्दादारी नहीं की

मुझे मुफ़लिसी का लगा शौक़ ऐसा
अमीरों की महफ़िलशुमारी नहीं की

ख़ुदा ने बनाया है ऐसा ही मुझको
वहशत की उम्मीदवारी नहीं की

ग़ज़ल में तो बस हालेदिल ही लिखा है
‘रोहित’ ने कोई फ़नकारी नहीं की

रोहित जैन
22-6-2010

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जो पारसा थे वो भी गुनहगार हो गए

जो पारसा थे वो भी गुनहगार हो गए
बिकने को अब ईमान भी तैयार हो गए

हम सोचते तो थे के ज़माने से लड़ेंगे
इस सोच से गर्दे कूचा-ओ-बाज़ार हो गए

ऐसा दग़ा किया है दोस्तों ने क्या कहें
दुश्मन भी जिसको देख वफ़ादार हो गए

हमको सजा दिया है इस दुकाने जहां में
दुनिया के लोग अपने खरीदार हो गए

सोचा था के इख़लास-ओ-वफ़ा से जीतेंगे दुनिया
ये पैंतरे अपने सभी बेकार हो गए

आँखें झुकीं रोईं भी हँसीं भी ड़रीं भी
कैसे ये सच आँखों में नमूदार हो गए

अच्छा बनूं बुरा बनूं इस सोच में ‘रोहित’
खुद से ही आज बरसरे पैकार हो गए

रोहित जैन
17-6-2010

पारसा = Religious
गर्दे कूचा-ओ-बाज़ार = Dust of houses and market places
इख़लास-ओ-वफ़ा = Friendship and Love
पैंतरे = Tricks
नमूदार = Apparent / Menifested
बरसरे पैकार = Engaged in battle

आप भी अजीब हैं

आप भी अजीब हैं
क्यूँ मेरे करीब हैं

देते हैं दवा में ज़हर
ये मेरे तबीब हैं                  तबीब == Healers

उम्र की दुआ न दो
धड़कनें मुहीब हैं                  मुहीब == Dreadful

आपको भी प्यार है
आप बदनसीब हैं

जिनके पास माल है
दिल से वो गरीब हैं

होंठ पर रहे हँसी
ऐसे कब नसीब हैं

जिनका छुरा है पीठ में                 छुरा == Knife
आपके हबीब हैं

जो देखते हैं आईना
अक्स तक सलीब हैं              सलीब == Cross

‘रोहित’ किसे आवाज़ दे
दोस्त भी रक़ीब हैं                 रकीब == Enemy
रोहित जैन
29-09-2008

Published in: on अक्टूबर 1, 2008 at 10:51 अपराह्न  Comments (3)  
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तुम भी

दिल जो टूटा तो बताओ के किधर जाओगे
तुम भी इस राह में आखिर को बिखर जाओगे

हद से हद ये ही मिलेगा मुझे चाहत का सिला
तुम भी दो फूल मेरी लाश पे धर जाओगे

आज तक कश्तियां ड़ूबी हैं मोहब्बत में सभी
तुम कोई ख़ास हो जो पार उतर जाओगे

कौन रुकता है यहां घर कोई जलता हो जले
तुम भी आओगे और चुपचाप गुज़र जाओगे

तुम भी औरों की तरह जीते रहोगे यूंही
तुम भी औरों की तरह एक दिन मर जाओगे

रुखेहैरान परेशान और ये ज़र्द-लिबास
तुम भी देखोगे जो आईने में ड़र जाओगे

न यहां कोई मसीहा ना कोई पैग़म्बर
तुम भी इन्सान ही पाओगे जिधर जाओगे

कितने आये गये क्या क्या किया, फ़रक़ क्या है
तुम भी ‘रोहित’ जो जलोगे तो सुधर जाओगे

रोहित जैन
24-09-2008

Published in: on सितम्बर 25, 2008 at 7:24 अपराह्न  Comments (6)  
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यादें बिन आये भी जब

यादें बिन आये भी जब सीने में जलने लगती हैं
तस्वीरें रंग बदलती हैं तन्हाई में बोलने लगती हैं

तारीकी ऐब छुपाती है इन आँखों का उन आँखों से
पहले तो ख़्वाब पिरोती हैं फिर आँखें भीगने लगती हैं

ज़िंदा रहने की ख़्वाहिश जब इक हद तक आ जाती है तो
वो यादें हों तन्हाई हो सब पीछे छूटने लगती हैं

चाँद से ख़ौफ़ जो होता है तो आलम ऐसा होता है
वीरानों में जलती शम्में भी लौ को तोलने लगती हैं

जब ज़िम्मेदारी औरों की इस ज़हन पे ज़ाहिर होती है
दिल की ज़मीं दरकती है और राहें खुलने लगती हैं

क्या क्या दिखने लगता है फिर क्या क्या होने लगता है
इस दिल के मैख़ाने में जब वो यादें ढ़ुलने लगती हैं

ये वक़्त के हाथ में है ‘रोहित’ के मोहलत कितनी देता है
वर्ना पल दो पल की साँसें सदियों को लीलने लगती हैं

रोहित जैन
22-09-2008

और भी काम हैं ज़माने में

बहुत दिनों से ग़ैरहाज़िर हूँ जिसके लिये माफ़ीगुज़ार हूँ. अपनी हालत बयां करने के लिये एक फ़ैज़ साहब का शेर अर्ज़ कर रहा हूँ –

दुनिया ने तेरी याद से बेग़ाना कर दिया
तुझसे भी दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के

एक नई ग़ज़ल लिखी है पेशेख़िद्मत कर रह हूँ…

नाम बदनाम है ज़माने में
हाय क्या रंग है फ़साने में

जिसको भूला वो एक पल में यहां
किया वो इश्क़ था ज़माने में

हम तो पहुँचे थे वक़्त पर लोगों
लगा उसे ही वक़्त आने में

उससे पूछो के जिस पे गुज़रा है
किस्सा आसां है जो सुनाने में

मुझको हर बार यकीं होता है
गज़ब अंदाज़ हर बहाने में

जो हमेशा से कहीं क़ायम था
लगे हैं उसको आज़्माने में

वो भटकता था इश्क़ का मारा
होश आये हैं अब ठिकाने में

जलनेवाला तो फ़ना था शायद
किसने दी है ख़बर ज़माने में

हाथ ख़ारों से भर गये मेरे
फूल इक ज़ुल्फ़ में सजाने में

सारी दुनिया ही लुट गई मेरी
उसको अपना ख़ुदा बनाने में

पनाह हसरतों में ढ़ूंढ़ते थे
लगे थे हम भी सर छुपाने में

कितना मजबूर हो गया था कभी
उसे मै हाल-ए-दिल सुनाने में

ज़ख़्म-ए-दिल से ही रोशनी है यहां
दिया यही है आशियाने में

बस यही सोचकर के मै चुप ही रहा
तेरा भी ज़िक़्र है फ़साने में

साँस हो ख़वाब हो या हो हस्ती
वक़्त लगता नहीं है जाने में

ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था वजूद
चंद टुकड़े खुशी के पाने में

वक़्त कितना लगा था बसने में
लगा था पल ही बस जलाने में

हम भी खुश हैं, नहीं है कोई भी ग़म
लगे थे हम भी ये दिखाने में

बख़्श दे ऐ ख़ुदा तू ‘रोहित’ को
और भी काम हैं ज़माने में

रोहित जैन
08-09-2008

आज तक जो भी हुआ प्रस्तावना है

आपको अब भी बहुत कुछ देखना है
आज तक जो भी हुआ प्रस्तावना है

चाँद तक जाने की राहें खोज लीं
दिल से दिल की राह किसको ढ़ूंढ़ना है

अब भी तुमको आस है क्या बात है
तुम भी पागल हो यही संभावना है

तुम शराफ़त से कराओगे ये काम
ये तो नियमों की कड़ी अवमानना है

टूट कर बिखरोगे अड़ियल ना बनो
जानते भी हो के किससे सामना है

लो नये नेताजी आते हैं यहाँ
हाथ में वादों का उनके झुनझुना है

कुछ तो सोचो कुछ विचारो यार तुम
अम्न-ए-आलम ये भी कोई कामना है

आप भी निकलें ज़रा ख़्वाबों से अब
आप का घर भी हवाओं में बना है

मै यूँ ही दहलीज़ पे बैठा हूं अब
क्या बला है ये सहर ये देखना है

 

रोहित जैन
18-04-2008

हम भी जिगर पे इख़्तियार रख लेंगे

हम भी जिगर पे इख़्तियार रख लेंगे
बंद आँखों में छुपा के प्यार रख लेंगे

एक पल क्या है तू जो कह दे तो
तमाम उम्र का हम इंतज़ार रख लेंगे

तेरी रुसवाई जो हो हमसे बात करने में
तुझे मिलेंगे और दिल को मार रख लेंगे

जो मन्नतें दैर-ओ-हरम की फलतीं हों
एकाध क्या है हम मन्नत हज़ार रख लेंगे

बस एक बार उठा दे ज़रा तू रुख़ से नक़ाब
उस एक याद से उम्र-ए-क़रार रख लेंगे

रोहित जैन
26-02-2008

मुझसे भी रकीबों की तरह बात ना करो

मुझसे भी रकीबों की तरह बात ना करो
मेरी ही बाज़ी में मुझे तुम मात ना करो

इक बार तो कह दो मुझे तुम अपना हालेदिल
मुझे क़त्ल इन्तेज़ार में दिन रात ना करो

ये खुल के शरमाना भी भला कैसी अदा है
ज़ुल्मोसितम पर ही गुज़र-औकात ना करो

आँखों में तेरा अक्स है ख़वाबों में तेरा रू
दिन को भी सितम और सितम रात ना करो

हमको जो मिला है वो तुम्ही से तो मिला है
अब तुम ही हमें भूलने की बात ना करो

हम कुछ नहीं कहते तो फिर ऐसा तो नहीं है
तुम भी कभी हम से कोई भी बात ना करो

मजबूर हैं हम और मोहब्बत भी बहुत है
अब और बुरे तुम मेरे हालात ना करो

रोहित जैन
15-01-2008

तुमने मुड़कर भी नहीं देखा मुझे जाते जाते

तुमने मुड़कर भी नहीं देखा मुझे जाते जाते
एक तकल्लुफ़ ही सही जिसको निभाते जाते

क्या ख़ता थी के टूट गये हैं सब रिश्ते
ये तो जाते हुए तुम मुझको बताते जाते

ना इख़लास कोई ना ही शिकायत कोई
कोई एहसान सही वो ही जताते जाते

संभलना कैसे है मुझको तेरे जाने के बाद
कम से कम ये ही हुनर मुझको सिखाते जाते

बड़ा हैरां सा परेशां सा भटकता हूं अब
कोई राह नई मुझको दिखाते जाते

अब भी उम्मीद है कभी मिल जाओगे तुम
किसी राह पर मुझको कहीं आते जाते

रोहित जैन
25-10-2007