गलती ही थी अदाकारी नहीं की

गलती ही थी अदाकारी नहीं की
तभी तो किसी से भी यारी नहीं की

ख़फ़ा मुझसे होने लगा है ज़माना
उसूलों से मैने गद्दारी नहीं की

बिकता अगर मै तो मौके बहुत थे
ज़मीर की फ़ितरत बाज़ारी नहीं की

गलत बात थी इसलिये लड़ पड़ा था
ख़ता कोई ऐसी तो भारी नहीं की

अकेला ही था मै जहां के मुक़ाबिल
किसी ने मेरी ग़मगुसारी नहीं की

वही बात बोली जो रखी ज़हन में
सच-ओ-झूठ की पर्दादारी नहीं की

मुझे मुफ़लिसी का लगा शौक़ ऐसा
अमीरों की महफ़िलशुमारी नहीं की

ख़ुदा ने बनाया है ऐसा ही मुझको
वहशत की उम्मीदवारी नहीं की

ग़ज़ल में तो बस हालेदिल ही लिखा है
‘रोहित’ ने कोई फ़नकारी नहीं की

रोहित जैन
22-6-2010

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आज तक उन खुशबुओं का सिलसिला तोड़ा नहीं

आज तक उन खुशबुओं का सिलसिला तोड़ा नहीं
दिल अपना जलाया मगर उसका दिल तोड़ा नहीं

तुम भी देके देख लो, ग़म से मै ड़रता नहीं
जैसी भी रही ज़िंदगी मुँह कभी मोड़ा नहीं

रात कि महफ़िल सजी थी, चाँद का गिलास था
ग़म पिये तो क्या हुआ पर वो मज़ा छोड़ा नहीं

ये भी क्या सवाल है के इश्क़ कितना चाहिये
दिल तो बच्चे की तरह है, सब मिले थोड़ा नहीं

ये इश्क़ का तूफ़ान है, कोई सलामत ना रहा
जानता था मै भी ये पर नाव को मोड़ा नहीं

अब तो ‘रोहित’ को बताओ अस्ल में लिक्खा था क्या
आज तक समझा नहीं, पुर्ज़ों को भी जोड़ा नहीं

रोहित जैन
24-04-2008

और नहीं

मरने की दुआ दे दो हमको जीने का तमाशा और नहीं
इस रंज मुसीबत ग़म से भरी दुनिया की तमन्ना और नहीं

साहिल पे अड़े तूफ़ानों के सहता हूं थपेड़े मुद्दत से
अब हार गया हूं दुनिया से कश्ती ये शिकस्ता और नहीं

अश्क़ गिराये थे हमने के दिल की आग बुझायेंगे
आग नई इन अश्क़ों से हर बार लगाना और नहीं

दुनिया समझी है हमको और हम भी समझ गए दुनिया
अब दानिशमंदी कहती है के दुनिया दुनिया और नहीं

दिल के टुकड़ों को हौले से अब जोड़ा है, समझाया है
अब ग़म तो क्या ज़िक्रेग़म भी इस दिल को गंवारा और नहीं

था चाक जिगर मोहताजेरफ़ू मुश्किल से छुपे हैं छेद सभी
अब ठानी है हमने दिल में ये शौकेबहारां और नहीं

हम क़त्ल हुए हैं पहले ही इक बार नहीं सौ बार यहां
अश्क़ों की ज़बां से आती उन आहों का इशारा और नहीं

आहें देखीं रुसवाई भी अश्क़ों से भरी तन्हाई भी
सब देख चुका हूं दुनिया में इक और नज़ारा और नहीं

उस दिन के लिये ‘रोहित’ सह ली ज़ुल्मत सारी इस दुनिया की
जो होना हो अब हो जाये, अब ख़ौफ़-ए-ख़ुदाया और नहीं
रोहित जैन
16-04-2008

Published in: on अप्रैल 16, 2008 at 3:20 अपराह्न  Comments (1)  
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कोई मुग़ालता तो नहीं

देख आऊं वो गिरा खून कहीं मेरा तो नहीं
मेरी ही लाश सजी हो कहीं ऐसा तो नहीं

टूट ही जाते हैं ख़्वाब, साँस और उम्मीदें
सोचता हूं मुझे भी इनपे भरोसा तो नहीं

तबस्सुम सोचती रहती है हमेशा वो रहे
कहीं आपको भी ऐसी ही तमन्ना तो नहीं

मौसमी बर्फ़ हैं रिश्ते, ये पिघल जायेंगे
इन्ही शाखों पे आपका भी बसेरा तो नहीं

बोझ अश्कों का उठाएगी कई पुश्त ज़मीं
देखिये आप से कोई कहीं रुसवा तो नहीं

करूंगा याद मै हर बात जो बीती मुझ पर
फिर मै देखूंगा कहीं ज़ख़्म वो ताज़ा तो नहीं

उसे तो शौक है यारों के वो दिल से खेले
आपके दिल में भी ऐसा कोई जज़्बा तो नहीं

नशा कैसा भी हो इक रोज़ उतर जायेगा
‘रोहित’ तुम्हे भी कोई मुग़ालता तो नहीं
रोहित जैन
15-04-2008

क्यों नहीं जाता

ये ज़ख़्म-ए-जुदाई मेरा भर क्यों नहीं जाता
वो शख़्स मेरे दिल से उतर क्यों नहीं जाता

कब तक रहूं हैरान परेशान हर घड़ी
वो शख़्स कोई फ़ैसला कर क्यों नहीं जाता

क्यों मेरे ही पहलू में ये आता है लौटकर
ये ग़म ज़रा पूछो के उधर क्यों नहीं जाता

हर बार मेरे ज़ेहन में बस वो ही इक ख़याल
चाहूं भुलाना लाख मगर क्यों नहीं जाता

पहले तो कभी खोने का तुझको था ड़र मुझे
अब तेरे कहीं मिल जाने का ड़र क्यों नहीं जाता

क्या क्या जुड़ीं है याद क़यामत सी उस जगह
बस मै ही जानता हूं मै घर क्यों नहीं जाता

क्यों साँस ले रहा है वो बेजान रूह में
कह दो ज़रा ‘रोहित’ से के मर क्यों नहीं जाता

रोहित जैन
09-03-2008

आज तक समझा नहीं मै क्यों गया तू छोड़कर

आज तक समझा नहीं मै क्यों गया तू छोड़कर
क्या कमी थी प्यार में रिश्ते गया सब तोड़कर

देख तू आ के ज़रा मेरी किताब-ए-ज़िंदगी
जिस जिस पे तेरा नाम वो पन्ना रखा है मोड़कर

एक शब जाती नहीं जब याद तू आता नहीं
आज भी सोता हूँ मै ख़्वाबों में तुझ को ओढ़कर

आज भी उम्मीद है के तू कहीं मिल जायेगा
और लगा लूंगा तुझे सीने से अपने दौड़कर

रोहित जैन
15-02-2008

मेरी ज़िंदगी में सहारा नहीं है

मेरी ज़िंदगी में सहारा नहीं है
किस किस को मैने पुकारा नहीं है

निकलता हूँ घर से तो ये सोचता हूँ
वो क्या कर्ज़ है जो उतारा नहीं है

हर इक अपने साहिल पे पहुँचा हुआ है
कश्ती को मेरी ही किनारा नहीं है

सभी खुश हैं लेकिन मुझे बोलते हैं
तू ही इस जहां में बेचारा नहीं है

मोहब्बत में मेरी कमी होगी शायद
कोई दोष शायद तुम्हारा नहीं है

किस दर पे जाऊं कहाँ सर झुकाऊं
किस किस ख़ुदा को उतारा नहीं है

जो मरते हैं पल पल ज़रा उनसे पूछो
मौत कहते हैं यूँ तो दोबारा नहीं है

रोहित जैन
12-01-2008

हूँ चल रहा उस राह पर जिसकी कोई मंज़िल नहीं

हूँ चल रहा उस राह पर जिसकी कोई मंज़िल नहीं
है जुस्तजू उस शख़्स की जो कभी हासिल नहीं

वहम जाने ये मेरे इस दिल को क्योंकर हो गया
कुछ भी कर लूं मै मगर मै जीत के काबिल नहीं

मै खड़ा हूँ आज देखो इश्क़ की दहलीज़ पर
पार निकलूं या रुकूं इस से बड़ी मुश्किल नहीं

एक महफ़िल में हज़ारों महफ़िलें हैं हर तरफ़
दिल में तन्हाई की महफ़िल क्या कोई महफ़िल नहीं

ज़िंदगी बेमक़सदी का दूसरा इक नाम है
कह दो किस की ज़िंदगी में दर्द ये शामिल नहीं

रोहित जैन
19-11-2007

तुमने मुड़कर भी नहीं देखा मुझे जाते जाते

तुमने मुड़कर भी नहीं देखा मुझे जाते जाते
एक तकल्लुफ़ ही सही जिसको निभाते जाते

क्या ख़ता थी के टूट गये हैं सब रिश्ते
ये तो जाते हुए तुम मुझको बताते जाते

ना इख़लास कोई ना ही शिकायत कोई
कोई एहसान सही वो ही जताते जाते

संभलना कैसे है मुझको तेरे जाने के बाद
कम से कम ये ही हुनर मुझको सिखाते जाते

बड़ा हैरां सा परेशां सा भटकता हूं अब
कोई राह नई मुझको दिखाते जाते

अब भी उम्मीद है कभी मिल जाओगे तुम
किसी राह पर मुझको कहीं आते जाते

रोहित जैन
25-10-2007

सच शय है वो जिसको कभी बोला नहीं जाता

सच शय है वो जिसको कभी बोला नहीं जाता
अपनी ही क़ब्र को कभी खोला नहीं जाता

क्या रंग सियासत ने दिया है जहान को
बन्दों को गिना जाता है तोला नहीं जाता

किसके लहू का रंग है दामन पे बता दे
जो लाख धोने पर मेरे मौला नहीं जाता

जहां मुल्क के बंदे हैं गुलामी पे रज़ामंद
वहां उनको भड़काने कोई शोला नहीं जाता

अब वो भी जानता है कुछ हो नहीं सकता
अब लेके सहर आग का गोला नहीं जाता

रोहित जैन
10-10-2007