है दर्द भी अजीब

है दर्द भी अजीब, कैसा खेल करता है
भरा जो एक ज़ख़्म, एक नया उभरता है

गिनूं तो दिन हुए कितने बिछड़ के उनसे मुझे
वो लम्हा दिल पे मेरे बारहा गुज़रता है

मै आँख भर के कई बार रो चुका हूँ मगर
ना जाने कौन नए अश्क़ इनमें भरता है

है इस क़दर को बदनसीब बदनसीबी यहां
हर एक श्ख़्स बला नाम इसके करता है

वो मुझसे कहता तो था उम्रभर की दोस्ती है
जो वक़्त मेरा बुरा है तो अब मुकरता है

क्या तेरा कोई हक़ चुरा लिया है मैने अज़ाब?
जो घूम फिर के तू मेरे ही दर ठहरता है

उसे मै भूल गया हूं मुझे यकीं है तो फिर
ये कौन मुझको मुसलसल उदास करता है

ये कैसा ग़म का तलातुम है तू बता ‘रोहित’
जो मुझको और ड़ुबाता है जो उतरता है

रोहित जैन
25-04-2011

Advertisements

चाँद दर्द का जला, दिल में उतरी चाँदनी

चाँद दर्द का जला, दिल में उतरी चाँदनी
तन्हाई ही छोड़ गई, जहाँ पे बिखरी चाँदनी

ढ़ूंढ़ता ही रह गया सहर, शफ़क, शमा, सुकून
अंधियारा ही हाथ लगा ऐसी गुज़री चाँदनी

यूँ तो मेरी मय्यत पर सूरज भी रोने आया था
इसको ही बस इल्म नहीं, कुछ ना समझी चाँदनी

वो दामन नहीं गरेबाँ था जो फ़टा सा हाथ में आया था
हर एक ताना तोड़ गई कुछ ऐसी अखरी चाँदनी

रोहित जैन
28/03/2007