तू था? तेरा साया था?

तू था? तेरा साया था?
ग़म ने भेस बनाया था

वो आहें मुझ तक पहुँचीं
जिनको तूने लौटाया था

वैसे ही ग़म पाये हैं
जैसे तुझको पाया था

मजनू-ओ-महिवाल का किस्सा
मैने भी दोहराया था

ख़ुशबू आई है झोंके में
तुझसे मिलके आया था

वो लोग हमें समझाते हैं
जिनको हमने समझाया था

जिस हुक़्म से मेरा क़त्ल हुआ
तुझसे ही तो आया था

जिस जिस को अपना समझा
वो ही यहाँ पराया था

दिल में लहरें उठती हैं
इक कंकर टकराया था

‘रोहित’ जिस से चौंका है
वो उसका ही साया था

रोहित जैन
2-11-2010

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Published in: on नवम्बर 3, 2010 at 6:18 पूर्वाह्न  Comments (2)  
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आज तक समझा नहीं मै क्यों गया तू छोड़कर

आज तक समझा नहीं मै क्यों गया तू छोड़कर
क्या कमी थी प्यार में रिश्ते गया सब तोड़कर

देख तू आ के ज़रा मेरी किताब-ए-ज़िंदगी
जिस जिस पे तेरा नाम वो पन्ना रखा है मोड़कर

एक शब जाती नहीं जब याद तू आता नहीं
आज भी सोता हूँ मै ख़्वाबों में तुझ को ओढ़कर

आज भी उम्मीद है के तू कहीं मिल जायेगा
और लगा लूंगा तुझे सीने से अपने दौड़कर

रोहित जैन
15-02-2008