क्यों नहीं जाता

ये ज़ख़्म-ए-जुदाई मेरा भर क्यों नहीं जाता
वो शख़्स मेरे दिल से उतर क्यों नहीं जाता

कब तक रहूं हैरान परेशान हर घड़ी
वो शख़्स कोई फ़ैसला कर क्यों नहीं जाता

क्यों मेरे ही पहलू में ये आता है लौटकर
ये ग़म ज़रा पूछो के उधर क्यों नहीं जाता

हर बार मेरे ज़ेहन में बस वो ही इक ख़याल
चाहूं भुलाना लाख मगर क्यों नहीं जाता

पहले तो कभी खोने का तुझको था ड़र मुझे
अब तेरे कहीं मिल जाने का ड़र क्यों नहीं जाता

क्या क्या जुड़ीं है याद क़यामत सी उस जगह
बस मै ही जानता हूं मै घर क्यों नहीं जाता

क्यों साँस ले रहा है वो बेजान रूह में
कह दो ज़रा ‘रोहित’ से के मर क्यों नहीं जाता

रोहित जैन
09-03-2008

Advertisements

सच शय है वो जिसको कभी बोला नहीं जाता

सच शय है वो जिसको कभी बोला नहीं जाता
अपनी ही क़ब्र को कभी खोला नहीं जाता

क्या रंग सियासत ने दिया है जहान को
बन्दों को गिना जाता है तोला नहीं जाता

किसके लहू का रंग है दामन पे बता दे
जो लाख धोने पर मेरे मौला नहीं जाता

जहां मुल्क के बंदे हैं गुलामी पे रज़ामंद
वहां उनको भड़काने कोई शोला नहीं जाता

अब वो भी जानता है कुछ हो नहीं सकता
अब लेके सहर आग का गोला नहीं जाता

रोहित जैन
10-10-2007