क्या बात है?

कुछ दिन पहले कृष्ण बिहारी ‘नूर’ साहब का एक शेर पढ़ा.

क्या बताएं क्या अज़ीम उसकी ज़ात है
सागर को सीपियों से उलचने की बात है

इसके मिसरा-ए-ऊला से प्रेरणा ले के एक मतला लिखा और फिर एक ग़ज़ल कहने की कोशिश की है…

आपकी अमूल्य टिप्पणी का मुन्तज़िर हूँ…

तुम इश्क को मेरे परखते हो? क्या बात है?
सागर को सीपियों से उलचते हो? क्या बात है?

जब जानते हो खून तो ताजा ही आएगा
तुम ज़ख्म को अपने खुरचते हो? क्या बात है?

महकते थे बहकते थे मचलते थे संभलते थे
सिसकते हो सुबकते हो? क्या बात है?

26-11-2010

वो बेवफ़ा था, और ये कह भी गया कम्बक़्त वो
तुम उसी की राह तकते हो? क्या बात है?

एक ही मुश्किल है के मुश्किल बहुत है भूलना
पर याद तुम दिन रात करते हो? क्या बात है?

जिस मोड़ से रहने की दूर तुम कसम खा आए थे
उस मोड़ पर अब भी ठहरते हो? क्या बात है?

एक ज़माने में जिन्हे तुम ही ने समझाया था इश्क़
इश्क़ अब उनसे समझते हो? क्या बात है?

आँख की गहराइयों में, दिल के अंधियारों के बीच
यूँ शमा बनकर पिघलते हो? क्या बात है?

दिल गया तो आँख को कैसा दिया है काम ये
बस वही तस्वीर तकते हो? क्या बात है?

तुमने ‘रोहित’ से कहा था इश्क़ ग़म का नाम है
बात से अपनी पलटते हो? क्या बात है?

14-12-2010

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Published in: on दिसम्बर 14, 2010 at 2:52 अपराह्न  Comments (4)  
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क्या क्या

कौन ये कश्ती ले उतरा तूफ़ान में
इतना दम कब से आया इन्सान में

वो देखता रह्ता है आसमां की तरफ़
कोई रहता होगा आसमान में

मेरी बातें कोई भी समझा ही नहीं
शायद होगी कोई कमी बयान में

बाकी सब कुछ तो पाया हमने यारों
खुशी नहीं मिल पाई भरे जहान में

इस्लाह करे कोई तो कोई बात बने
कैसे कैसे भरे हैं लब्ज़ ज़बान में

गुस्सा भी है और तलब तहज़ीब भी है
दो दो तलवारें हैं एक मयान में

आबोहवा के नुक़्स से हालत है ये
वरना कोई कमी नहीं इन्सान में

ले दे के अब दिल भी मान गया है ये
कुछ भी नहीं धरा है अब ईमान में

मुझको तो बातें कल की भी याद नहीं
कैसे रखते हो बरसों को ध्यान में

होश गया हवास गया छूटी तौफ़ीक़
बस मुर्दा सा जिस्म बचा सामान में

‘रोहित’ ग़म, आँसू, उम्मीदें, ख़्वाब भी कुछ
क्या क्या भर रक्खा है दिल-दुकान में

रोहित जैन
19-09-2008

Published in: on सितम्बर 19, 2008 at 6:41 अपराह्न  Comments (6)  
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उस इम्तिहान के पल में हम क्या कहें के झिझक गए

मेरे अश्क़ेनामुराद यूं, निगाह से थे छलक गए
चरागेदिल को बुझा गए, ये आज ऐसे चमक गए

हमें प्यास थी दीदार की, हो जाए झलक रुख़ेयार की
जिस पल गिरा उनका नक़ाब, उसी पल में पलकें झपक गए

मिलके भी तो हम ना मिले, थे दर्मियां कई फ़ासले
और वहशतेइश्क़ में, हम राह अपनी भटक गए

जो उन से मिली मेरी नज़र, उतरी बची सारी कसर
चले थे गुल की तलाश में, और ख़ार में हम अटक गए

शाखेज़हन की कली कली, महकी थी उसके ख़याल से
वो तस्सवुरेजाना किया, हम डाली डाली लचक गए

मुझे इश्क़ बेशुमार था, उसे भी कहां इनकार था
उस इम्तिहान के पल में हम क्या कहें के झिझक गए

रोहित जैन
31-03-2008

क्या देंगे

खाली है जिनका दामन वो हिसाब क्या देंगे
सब सवाल ही गलत हैं फिर जवाब क्या देंगे

हर तरफ़ हर जगह हर इक शरीक-ए-जुर्म है
जो ख़ुद हैं बेपरदा तुम्हे नक़ाब क्या देंगे

ख़ुद झूमते गिरते हुए जाते हैं महफ़िल से
साक़ी ही हों नशे में तो शराब क्या देंगे

जो आँख ही मिला नहीं पाते ज़माने से
पढ़ने को तुम्हे दिल की किताब क्या देंगे

दिल में रहते हैं मगर आँख से परदा करें
ऐसे शख़्स किसी को हंसीं ख़्वाब क्या देंगे

रोहित जैन
19-11-2007

घर हवाओं में बना टिकता है क्या

घर हवाओं में बना टिकता है क्या
जो मुसाफ़िर हो कहीं रुकता है क्या

हमने तुमको साँस में शामिल किया
साँस लेने से कोई थकता है क्या

है उसे भी शौक दिल से खेलना
देखिये वो आप सा लगता है क्या

हम तो यूँ ही मिल रहे हैं मुफ़्त में
कोइ आशिक़ मोल भी बिकता है क्या

इश्क़ देखेगा नहीं मज़हब कोई
ये किसी दीवार से रुकता है क्या

सच्चा है जो बंदा उसी की बात है
कट के गिरता है मगर झुकता है क्या

गिर गई दीवार और छत भी गई
उस घर में अब देखो कोई दिखता है क्या

गौर ना करना मेरे लब्ज़ों पे तुम
जो दिलजला हो वो भला लिखता है क्या

रोहित जैन
04-10-2007