आजकल के लोग

पत्थर में ढ़लने लग गए हैं आजकल के लोग
क़ब्रों में जलने लग गए हैं आजकल के लोग

जमहूरियत में कुछ भी कहो कुछ तो बात है
फिर से बहलने लग गए हैं आजकल के लोग

उनको पता चला है के साहिल बहुत है दूर
पानी पे चलने लग गए हैं आजकल के लोग

इक पल गले में बाँह थी, दूजे दबा दिया
कैसे बदलने लग गए हैं आजकल के लोग

ना दोस्ती ना प्यार ना रिश्तों पे है यकीं
सबसे संभलने लग गए हैं आजकल के लोग

स्याही बिखर गई है ज़माने पे कुफ़्र की
चेहरे पे मलने लग गए हैं आजकल के लोग

अब कोई ज़रूरत ही नहीं किसी की किसी को
तन्हा निकलने लग गए हैं आजकल के लोग

बच्चा छुपा हुआ है या शैतान है कोई
कैसे मचलने लग गए हैं आजकल के लोग

फ़ितरत की बात छोड़िये, इस दौर में हुज़ूर
चेहरे बदलने लग गए हैं आजकल के लोग

‘रोहित’ हवस की आग है ये, भूख की नहीं
जिस से पिघलने लग गए हैं आजकल के लोग

रोहित जैन
29-10-2010

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Published in: on अक्टूबर 29, 2010 at 9:46 पूर्वाह्न  Comments (2)  
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जिस्म के नेज़े पे जो रखा हुआ है

जिस्म के नेज़े पे जो रखा हुआ है
एक तमगा है जो बस लटका हुआ है

शहर में कैसा मचा है हंगामा
आज किसका दिल यहां रुसवा हुआ है

आप ही बुत जोड़ने को कह रहे हैं
आपके हाथों से जो तोड़ा हुआ है

ये अचानक आँच आई है कहां से
शोला-ए-दिल कौन सा भड़का हुआ है

आपको भी खुश नज़र मै आ रहा हूँ
आपकी आँखों को भी धोखा हुआ है

पूछते हो क्यों करी हैं बंद आँखें
एक दरिया अश्क़ का रोका हुआ है

चीखती तन्हाइयों की सर्द आहें
कैसा है ये शोर जो बरपा हुआ है

उसकी हर इक ज़िद मुझे करनी है पूरी
मै बड़ा हूँ और वो बच्चा हुआ है

एक पल उनको लगा तर्क़े वफ़ा में
एक पल में क्या कहूँ क्या क्या हुआ है

जिन पलों को याद कर मै जी रहा हूँ
वो ही हर पल बस उन्हे भूला हुआ है

मेरी रुसवाई पे क्यों हँसते हो ‘रोहित’
आपके भी नाम का चर्चा हुआ है

रोहित जैन
22-7-2010

सोच के देखो…

सोच के देखो प्यार में हम दोनों पूरे दीवाने हों
सोच के देखो दुनियाभर में अपने ही अफ़साने हों

सोच के देखो जुनूं इश्क़ के हम दोनों पर तारी हों
सोच के देखो दिन हैरां हों और रातें भी भारी हों

सोच के देखो दिल में अपने सचमुच के काशाने हों
सोच के देखो दो आँखों में सचमुच के मैख़ाने हों

सोच के देखो इश्क़ हक़ीक़त बाकी सब कुछ माया हो
सोच के देखो इश्क़ इश्क़ ही इस दुनिया पर छाया हो

सोच के देखो दिल की बातें सारी तुम्हे बताईं हों
सोच के देखो कुछ बातें हमने तुमसे भी छुपाई हों

सोच के देखो होठों पर मुस्कानें भरने वाली हों
सोच के देखो आँखों से दो बूँदें गिरने वाली हों

सोच के देखो चाँद सितारे तुम्हे देखकर चलते हों
सोच के देखो फूल बहारों के भी तुमसे जलते हों

सोच के देखो अंधियारों के बीच कहीं उजियारे हों
सोच के देखो ग़म के लम्हे जीवन में बंजारे हों

सोच के देखो चाँद पे सुंदर सुंदर परियां रहतीं हों
सोच के देखो इन्द्रधनुष में सतरंगी नदियां बहतीं हों

सोच के देखो ये बादल सच में ज़ुल्फ़ों के साए हों
सोच के देखो ये साये सारी दुनिया पर छाए हों

सोच के देखो सुर्ख़ लबों से फूल गुलाब के गिरते हों
सोच के देखो आँखों से सचमुच के मोती झरते हों

सोच के देखो तारे थक कर सुबह कहीं सो जाते हों
सोच के देखो चकोर चाँद से मिलने उड़कर जाते हों

सोच के देखो गंगा में पाप सभी धुल जाते हों
सोच के देखो वक़्त के सागर में सब ग़म घुल जाते हों

सोच के देखो जो सोचा वो सब हक़ीक़त हो जायें
सोच के देखो सब लम्हे ख़्वाबों से खूबसूरत हो जायें

रोहित जैन
22-6-2010

वो बहुत याद आए भुलाने के बाद

वो बहुत याद आए भुलाने के बाद
आग बुझती नहीं है ज़माने के बाद

और इस से बड़ी कोई मुश्किल नहीं
ज़िंदगी बढ़ गई ज़हर खाने के बाद

इतना अंधा किया फ़ुरक़ते यार ने
दिल जलाना पड़ा उसके जाने के बाद

हुआ हाल ऐसा मेरा हिज्र में
होश आया है अब घर जलाने के बाद

आईने से निगाहें मिला ना सका
ख़ुद अपना ख़ुलूस आज़माने के बाद

ज़ख़्मे दिल और दागे जिगर मिल गए
तुम्हे दोस्त अपना बनाने के बाद

हमने सोचा के मै से सुकून आएगा
आग और बढ़ गई ये बुझाने के बाद

खून कितने पतंगों का होता है उफ़!
मेरी क़ब्रे शम्मा जलाने के बाद

क्या कहे तुम से ‘रोहित’, बताए वो क्या
कैसा लगता है यूं मौत आने के बाद

रोहित जैन
24-09-2009

उस इम्तिहान के पल में हम क्या कहें के झिझक गए

मेरे अश्क़ेनामुराद यूं, निगाह से थे छलक गए
चरागेदिल को बुझा गए, ये आज ऐसे चमक गए

हमें प्यास थी दीदार की, हो जाए झलक रुख़ेयार की
जिस पल गिरा उनका नक़ाब, उसी पल में पलकें झपक गए

मिलके भी तो हम ना मिले, थे दर्मियां कई फ़ासले
और वहशतेइश्क़ में, हम राह अपनी भटक गए

जो उन से मिली मेरी नज़र, उतरी बची सारी कसर
चले थे गुल की तलाश में, और ख़ार में हम अटक गए

शाखेज़हन की कली कली, महकी थी उसके ख़याल से
वो तस्सवुरेजाना किया, हम डाली डाली लचक गए

मुझे इश्क़ बेशुमार था, उसे भी कहां इनकार था
उस इम्तिहान के पल में हम क्या कहें के झिझक गए

रोहित जैन
31-03-2008

दुख के चेहरे पर लकीरें याद की

दुख के चेहरे पर लकीरें याद की
सुन रहा हूं सदा दिलेबरबाद की

तेरी महफ़िल तेरा परचम ओ’ हुजूम
अब किसे है फ़िक़्र इस नाशाद की

तूने जीते जी ही मारा है मुझे
अब ज़रूरत ही नहीं जल्लाद की

क्यों न टूटूं क्यों न रो’ऊं ये बता
इन्सान हूँ, मूरत नहीं फ़ौलाद की

है तबियत ये के खुद मिट जायेंगे
क्या ज़रूरत है किसी की याद की

मुझसे बोला अब ज़माने से न बोल
और ना तौहीन कर फ़रियाद की

जो क़रम होता नहीं तो ना सही
हमको भी आदत नहीं है दाद की

सोचता हूं के परों को तोड़ना
आपकी फ़ितरत है या सैय्याद की

हर तरह से तोड़ के देखा ये दिल
है ज़रूरत अब नई ईजाद की

पूरी महफ़िल ही ग़मों में चूर है
क्या करें कोशिश अब इसकी शाद की

क्या इमारत क्या मकां क्या झोंपड़ा
तोड़ दी बुनियाद हर बुनियाद की
रोहित जैन
28-02-2008

निगाहों के आसपास

कुछ ख्वाब सजा रखे हैं निगाहों के आसपास
कुछ गुल खिला रखे हैं निगाहों के आसपास

तू मुत्तसिल हो तो ही तो बन पाये आशियां
कुछ तिनके जला रखे हैं निगाहों के आसपास

ड़रते भी हैं के खोलें ना खोलें इस आँख को
कुछ धोखे भी खा रखे हैं निगाहों के आसपास

तुझे देखकर झुकतीं है तो तू गलत ना समझ
कुछ लब्ज़-ए-दुआ रखे हैं निगाहों के आसपास

रोहित जैन
21-02-2008

दिल के तलबखाने में आज कैसी शकेबाई सी है

दिल के तलबखाने में आज कैसी शकेबाई सी है
कोई साज़ नहीं है कानों में शहनाई सी है

हाय तमाशा क्या लगा है मेरे दिल के आस पास
सुरूर-ए-कैफ़ की बारिश है और तन्हाई सी है

आँखों में इक जुस्तजू है ज़ेहन में मेरे तलाश
आरज़ू थोड़ी ड़री है थोड़ी घबराई सी है

ये क्या जलवा-ए-इश्क़ है क्या है ये उन की अदा
कर के निगाह-ए-करम अब वो शरमाई सी है

वो थी शबनम इश्क़ की या शरारा था कोई
जला के भी जिस ने मुझे राहत ही पहुँचाई सी है

लौट आये हैं जो वापिस तो ये लगता है हमें
जैसे मंज़िल इश्क़ की खुद ही ठुकराई सी है

मान लेता हूँ के उस को इश्क़ से तौबा सही
ज़ुल्फ़ उस ने बेवजह फ़िर क्यों उलझाई सी है

बैठे बैठे क्यों गुमां हो रहा है आज ये
चार-जानिब से घटायें इश्क़ की छाई सी है

साक़ी-ए-मदहोश की महफ़िल का सितम कैसा है
वो नशा बन के मेरी रगेजां में समाई सी है

जब कभी देखा इसे तो ये ही मैने पाया है
ज़ीस्त के औराब पर यादों की रोशनाई सी है

चराग-ए-सोज़-ए-ग़म रोहितबुझ ना जाये कहीं
इस नूर से ही ज़िंदगी मैने ये सजाई सी है

रोहित जैन
01-02-2008

 

शकेबाई = Peace

आज भी थोड़ा सा पढ़ के छोड़ दिया है

आज भी थोड़ा सा पढ़ के छोड़ दिया है
ज़िंदगी का एक और सफ़हा मोड़ दिया है

आज फिर सोचा के चुन लूँ ख़ार कुछ नये
आज फिर ड़ाली को छू के छोड़ दिया है

अब वो नहीं आते हैं ना आवाज़ आती है
उस आखरी उम्मीद को भी छोड़ दिया है

आखरी लम्हे में भी बस मुस्कुराहट का जवाब
हर बात को फिर से अधूरा छोड़ दिया है

जुस्तजू खोए हुओं की उम्र भर रक्खी
एक रेत का घर था जिसे अब तोड़ दिया है

जिस्म के नेज़े पे रख दी आरज़ू-ए-ज़िंदगी
और फिर मुझको भटकता छोड़ दिया है

रोहित जैन
31/08/2007

ज़िन्दगी के मोड़ पर आके है ठहरी तिशनगी

ज़िन्दगी के मोड़ पर आके है ठहरी तिशनगी
साँस टुकड़ा अश्क़ धज्जी और गहरी तिशनगी

तन्हाइयां भी साथ हैं साथ है उम्मीद भी
कितनी सियाह और कितनी है सुनहरी तिशनगी

तिशनगी बेवा भी है तिशनगी है शोख़ भी
एक पल में ही उदासी और रुपहरी तिशनगी

प्यास कितनी पास है और दूर कितना नूर है
तिशनगी का तोड़ है बस और गहरी तिशनगी

नक़्श-ए-माज़ी भी यही और मुस्तकबिल भी है
रोशनी की छाँव है और रात ठहरी तिशनगी

हुस्न-ओ-इश्क़ ज़ख़्म-ओ-इबादत कोई शय छूटी नहीं
जिस जिन्स भी देखोगी बस है एक गहरी तिशनगी

याद के कंकर लगे और ज़ेहन के टुकड़े हुए
ज़र्रा ज़र्रा बिखरी मेरी इफ़्तार-ओ-सहरी तिशनगी

रोहित जैन
13/06/2007