हमने तो जाम में उतारा था

हमने तो जाम में उतारा था
वो जो वादा कभी तुम्हारा था

आँख में आँख का नज़ारा था
एक ऐसा भी इस्तिआरा था

तुम जो आए हो तो भला कैसे
हमने अल्लाह को पुकारा था

हमको तन्हाइयों के सहरा में
अश्क़ के आब का सहारा था

जब तुम से नहीं लगा था दिल
वक़्त तब भी यहां गुज़ारा था

आज तक भूलता नहीं ये दिल
कोई सदक़ा कभी उतारा था

हाय शर्माए थे वो देख मुझे
हाय ज़ुल्फ़ों को भी संवारा था

तेरे वादे से ड़र क्यूं लगता है
तब तो सब कुछ मुझे गंवारा था

तुमने टुकड़े उठाये थे जिसके
हाँ मेरा दिल था, पारा पारा था

आज ‘रोहित’ को कौन समझाए
उसके दिल ने ही उसको मारा था

रोहित जैन
13-11-2014

Published in: on अगस्त 3, 2015 at 7:52 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  
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उनको मैंने अपना माना

उनको मैंने अपना माना हाँ ये मैंने भूल करी
जान जलाकर मैंने अपनी आज ये भूल क़बूल करी

कोई फूल गुलाब का मिलता तो फिर कोई बात भी थी
खून बहाया मुफ़्त में हमने और ये ज़ीस्त बबूल करी

उसको पाया दुनिया पाई सोच के दाँव लगा बैठे
खुदको खोया दुनिया खोई और ज़िन्दगी धूल करी

जान लुटाई दिल भी लुटाया होश ही यार गंवा बैठे
अश्क़ बहाकर और ग़म खाकर दीवानगी वसूल करी

हद ही कर दी रोहितजी ने खुद ही खुद को भूल गए
अपने उसूलों पर जीते थे, ज़िन्दगी बेउसूल करी

रोहित जैन
28-11-2014

Published in: on जनवरी 4, 2015 at 6:31 अपराह्न  टिप्पणी करे