लोग जीते हैं मर नहीं पाते

लोग जीते हैं मर नहीं पाते
काम इतना सा कर नहीं पाते

सोचो कितने मरे हुए हैं वो
मौत से भी जो डर नहीं पाते

प्यार दुश्मन से किया था जितना
तुमसे उतना भी कर नहीं पाते

उन गरीबों का कौन हाकिम है
जो खुदा की नजर नहीं पाते

जिस गली में तुझे गंवाया था
अब वहां से गुजर नहीं पा‍ते

अपनी बर्बादियों के किस्से में
आपका कम असर नहीं पाते

शेर में हाल-ए-दिल बयां करना
ये हुनर भी अगर नहीं पाते

दिल की वीरान राह पर ‘रोहित’
काश उजड़े शहर नहीं पाते

28/29-07-2011

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Published in: on अगस्त 11, 2011 at 8:34 पूर्वाह्न  Comments (2)  

कैसा होगा?

तुझको खो कर फिर से पाना कैसा होगा?
दिल में फिर से आग लगाना कैसा होगा?

टुकड़ा-टुकड़ा, जर्रा-जर्रा बिखरा हूं मैं
एक सिफर फिर से बन जाना कैसा होगा?

रो-रोकर ये मेरी आंखें सूख चुकी हैं
फिर से एक सैलाब का आना कैसा होगा?

कितनी सारी बातें हैं तुझसे कहने की
तुझसे मिलके चुप हो जाना कैसा होगा?

कितनी मुश्किल से दुनिया में घुल पाया था
उकता के फिर खुद में जाना कैसा होगा?

रफ्ता-रफ्ता मर-मर के तुझको भूला था
याद में तेरी फिर जी जाना कैसा होगा?

जिस पन्ने पर मैंने खुद को छोड़ दिया था
उस पन्ने का फिर खुल जाना कैसा होगा?

क्या होगा गर फिर से मैं, मैं ही बन जाऊं?
फिर से मेरा दिल दीवाना कैसा होगा?

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Published in: on अगस्त 2, 2011 at 6:11 पूर्वाह्न  Comments (3)