है दर्द भी अजीब

है दर्द भी अजीब, कैसा खेल करता है
भरा जो एक ज़ख़्म, एक नया उभरता है

गिनूं तो दिन हुए कितने बिछड़ के उनसे मुझे
वो लम्हा दिल पे मेरे बारहा गुज़रता है

मै आँख भर के कई बार रो चुका हूँ मगर
ना जाने कौन नए अश्क़ इनमें भरता है

है इस क़दर को बदनसीब बदनसीबी यहां
हर एक श्ख़्स बला नाम इसके करता है

वो मुझसे कहता तो था उम्रभर की दोस्ती है
जो वक़्त मेरा बुरा है तो अब मुकरता है

क्या तेरा कोई हक़ चुरा लिया है मैने अज़ाब?
जो घूम फिर के तू मेरे ही दर ठहरता है

उसे मै भूल गया हूं मुझे यकीं है तो फिर
ये कौन मुझको मुसलसल उदास करता है

ये कैसा ग़म का तलातुम है तू बता ‘रोहित’
जो मुझको और ड़ुबाता है जो उतरता है

रोहित जैन
25-04-2011

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7 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. nice

  2. वो मुझसे कहता तो था उम्रभर की दोस्ती है
    जो वक़्त मेरा बुरा है तो अब मुकरता है

    न जाने कितने मोड़ों पर जीवन को मुड़ते देखा है।

  3. बेहतर…

  4. bahut barhiya….

  5. अच्छा लेखन है
    मन के विचार शब्दों का
    कहना मान रहे हैं ….

  6. वो मुझसे कहता तो था उम्रभर की दोस्ती हैजो वक़्त मेरा बुरा है तो अब मुकरता है
    +1

  7. kuch maan to kuch dard to ghazalome hi halka hota hai


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