रुसवाई

हर इक बाज़ी हार चुके हैं, खेल में हर इक मात हुई
दिन के उजियारे दुनिया में लेकिन दिल में रात हुई

जिसको हमने प्यार किया उसने ही दुश्मन मान लिया
कैसे सिफ़र हुए हैं अब हम, क्या अपनी औक़ात हुई

यूँ तो कल ही बिछड़े हैं हम फिर क्यों ऐसा लगता है
कितना अरसा बीत चुका है के जब तुमसे बात हुई

ग़म के क़ाज़ी ने पूछा तो हमने कहा क़बूल क़बूल
दिल के टुकड़ों की दावत है, अश्क़ों की बारात हुई

हमने सोचा कुछ तो मुक़द्दर बदलेगा बरसातों में
ऐसी किस्मत पाई है के पत्थर की बरसात हुई

अहलेदुनिया की ठोकर तो कितनी खाईं ‘रोहित’ ने
आपने भी जब ठोकर मारी, रुसवा अपनी ज़ात हुई

रोहित जैन
24-02-2011

Published in: on मार्च 3, 2011 at 8:33 पूर्वाह्न  Comments (3)  
Tags: , , , , , , , ,

The URI to TrackBack this entry is: https://rohitler.wordpress.com/2011/03/03/ruswai/trackback/

RSS feed for comments on this post.

3 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. ग़म के क़ाज़ी ने पूछा तो हमने कहा क़बूल क़बूल
    दिल के टुकड़ों की दावत है, अश्क़ों की बारात हुई

    बहुत गहरा।

  2. Awesome🙂

  3. हमने सोचा कुछ तो मुक़द्दर बदलेगा बरसातों में
    ऐसी किस्मत पाई है के पत्थर की बरसात हुई

    अहलेदुनिया की ठोकर तो कितनी खाईं ‘रोहित’ ने
    आपने भी जब ठोकर मारी, रुसवा अपनी ज़ात हुई

    bahut khoob har sher dilkash raha lekin ye aakhiri kuch jyada hi man ko bha gaye


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: