तू था? तेरा साया था?

तू था? तेरा साया था?
ग़म ने भेस बनाया था

वो आहें मुझ तक पहुँचीं
जिनको तूने लौटाया था

वैसे ही ग़म पाये हैं
जैसे तुझको पाया था

मजनू-ओ-महिवाल का किस्सा
मैने भी दोहराया था

ख़ुशबू आई है झोंके में
तुझसे मिलके आया था

वो लोग हमें समझाते हैं
जिनको हमने समझाया था

जिस हुक़्म से मेरा क़त्ल हुआ
तुझसे ही तो आया था

जिस जिस को अपना समझा
वो ही यहाँ पराया था

दिल में लहरें उठती हैं
इक कंकर टकराया था

‘रोहित’ जिस से चौंका है
वो उसका ही साया था

रोहित जैन
2-11-2010

Published in: on नवम्बर 3, 2010 at 6:18 पूर्वाह्न  Comments (2)  
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2 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. ळोग तो फेंक देते हैं कंकर, मन काँप जाता है।

  2. bahut badhiya rohit, Aapakee sabhee gazals achchhee hain.

    वो लोग हमें समझाते हैं
    जिनको हमने समझाया था

    ‘रोहित’ जिस से चौंका है
    वो उसका ही साया था


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