आजकल के लोग

पत्थर में ढ़लने लग गए हैं आजकल के लोग
क़ब्रों में जलने लग गए हैं आजकल के लोग

जमहूरियत में कुछ भी कहो कुछ तो बात है
फिर से बहलने लग गए हैं आजकल के लोग

उनको पता चला है के साहिल बहुत है दूर
पानी पे चलने लग गए हैं आजकल के लोग

इक पल गले में बाँह थी, दूजे दबा दिया
कैसे बदलने लग गए हैं आजकल के लोग

ना दोस्ती ना प्यार ना रिश्तों पे है यकीं
सबसे संभलने लग गए हैं आजकल के लोग

स्याही बिखर गई है ज़माने पे कुफ़्र की
चेहरे पे मलने लग गए हैं आजकल के लोग

अब कोई ज़रूरत ही नहीं किसी की किसी को
तन्हा निकलने लग गए हैं आजकल के लोग

बच्चा छुपा हुआ है या शैतान है कोई
कैसे मचलने लग गए हैं आजकल के लोग

फ़ितरत की बात छोड़िये, इस दौर में हुज़ूर
चेहरे बदलने लग गए हैं आजकल के लोग

‘रोहित’ हवस की आग है ये, भूख की नहीं
जिस से पिघलने लग गए हैं आजकल के लोग

रोहित जैन
29-10-2010

Published in: on अक्टूबर 29, 2010 at 9:46 पूर्वाह्न  Comments (2)  
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2 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. हर रोज ढह रहे हैं, आजकल के लोग।

  2. इक पल गले में बाँह थी, दूजे दबा दिया
    कैसे बदलने लग गए हैं आजकल के लोग

    ना दोस्ती ना प्यार ना रिश्तों पे है यकीं
    सबसे संभलने लग गए हैं आजकल के लोग

    स्याही बिखर गई है ज़माने पे कुफ़्र की
    चेहरे पे मलने लग गए हैं आजकल के लोग
    रोहित जी बहुत अच्छे शेर कहे हैं। आज की दुनिया पर हर शेर सटीक बैठता है। बधाई।


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