याद आते रहे, दिल दुखाते रहे

याद आते रहे, दिल दुखाते रहे
वो रह रह के हमको सताते रहे

शक्ल अपनी ही लगने लगी अजनबी
आईने उलझनों को बढ़ाते रहे

वो नज़रें झुकाने की उनकी अदा
हम फ़रेबेमोहब्बत को खाते रहे

जिस से गुज़रे थे हम सैकड़ों मर्तबा
हमारी मंज़िल वहीं वो बताते रहे

ऐसा छाया अंधेरों का हम पर सुरूर
शम्मेदिल रात दिन हम जलाते रहे

साहिलेज़ीस्त पर ग़म की लहरों के बीच
नाम उसका हम लिखते मिटाते रहे

तीरगी ऐसी फैली है हदेनिगाह
रंग ख़्वाबों से भी अपने जाते रहे

कैसी दुनिया बनाई है तूने ख़ुदा
कैद कैसी है जिसको निभाते रहे

दुश्मनों से मोहब्बत सी होने लगी
दोस्त ऐसे हमें आज़माते रहे

हमको आया ना ‘रोहित’ नुमाइशेज़ख़्म
खुद ही रोते रहे समझाते रहे

रोहित जैन
10-11-2009

Published in: on मई 8, 2010 at 4:50 अपराह्न  Comments (11)  

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11 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. After ages bro and this one is coool🙂

  2. कैसी दुनिया बनाई है तूने ख़ुदा
    कैद कैसी है जिसको निभाते रहे

    क्या बात है ! वाह !!

  3. क्या बात है ! वाह

  4. bahut khub

  5. दुश्मनों से मोहब्बत सी होने लगी
    दोस्त ऐसे हमें आज़माते रहे
    मै पहली बार आपके ब्लाग पर आया अच्छा लिखते हैं

  6. लगता है आप ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत से नहीं जुड़े हैं अगर नहीं तो जुड़िये

  7. शक्ल अपनी ही लगने लगी अजनबी
    आईने उलझनों को बढ़ाते रहे

    दुश्मनों से मोहब्बत सी होने लगी
    दोस्त ऐसे हमें आज़माते रहे

    आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ…..ग़ज़ल बहुत बढ़िया कही है..खास तौर पर ये शेर बहुत पसंद आये….मेरे ब्लॉग पर आने का शुक्रिया

  8. शक्ल अपनी ही लगने लगी अजनबी
    आईने उलझनों को बढ़ाते रहे

    kya baat hai ..aapke bhaavo mein sagar si gahraai h

    yakinan kabil-e-daad

    kubool karen

  9. rere bekhudi me lakho paigam likheta hai
    tere gam me beti gujari tamam likheta hai
    ab to pagal se ho gai hai vo kalam
    jis say hum tumahara nam likhata hai

  10. ummid puri the vo hamare honga
    kya pata tha vo kinare honge
    chato ka daur kam na hone diya
    jaha bhi tu rahe khusio ki bahare honge

  11. वाह क्या लीखा है दिल को छू गयी।


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