किसने बोला क़ज़ा से ड़रते हैं

किसने बोला क़ज़ा से ड़रते हैं
हम तो तेरी वफ़ा से ड़रते हैं

दुश्मनों का तो हम को ड़र ही नहीं
दोस्तों की दुआ से ड़रते हैं

इश्क़ होने का हमको ख़ौफ़ नहीं
हम तो बस इंतेहा से ड़रते हैं

किसी इन्सान से घबराएं क्यों
वो के जो बस ख़ुदा से ड़रते हैं

आप से प्यार है हमें मंज़ूर
के इज़हारे वफ़ा से ड़रते हैं

ये बीमारी ही हमको बेहतर है
चाराग़र की दवा से ड़रते हैं

जिनको अपनी छतों पे हो न यकीं
वो ही काली घटा से ड़रते हैं

यूं तो दम है जिगर में ‘रोहित’ के
फिर भी उस बावफ़ा से ड़रते हैं

रोहित जैन
07-08-09

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4 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. जिनको अपनी छतों पे हो न यकीं
    वो ही काली घटा से ड़रते हैं

    ye wala good hai.

  2. किसने बोला क़ज़ा से ड़रते हैं
    हम तो तेरी वफ़ा से ड़रते हैं
    इश्क़ होने का हमको ख़ौफ़ नहीं
    हम तो बस इंतेहा से ड़रते हैं
    लाजवाब सारी गज़ल अच्छी है बधाई

  3. Ateev sundar rachnayen!

  4. Hey Rohit,
    I am amazed dear… simply awesome thought & feelings… your view towards love is deep…you made me thrilled…to good…


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