कब जाने मोहब्बत में ये मक़ाम आ गया

कब जाने मोहब्बत में ये मक़ाम आ गया
बजाय ख़ुदा लब पे तेरा नाम आ गया

इसको अदा कहूँ के ये एहसान है तेरा
तर्क़े वफ़ा के बाद भी सलाम आ गया

अब कम से कम उसको मेरे मिलने का ड़र नहीं
मर के ही सही मै किसी के काम आ गया

सोचा था सुबह अब नहीं जाना है उसकी ओर
लो फिर से वहीं लेके अपनी शाम आ गया

हर बार जब मुझको लगा के भूल गया हूँ
जाने कहाँ से यक-ब-यक क़लाम आ गया

जब भी कभी मुझको तेरी यादों ने बुलाया
दिल हाथ में लेके तेरा ग़ुलाम आ गया

‘रोहित’ को भेजते हैं वो नामा-ए-शौक़े इश्क़
लगता है मुझे मौत का पयाम आ गया

रोहित जैन
31-03-2009

बजाय == In place of
तर्क़े वफ़ा == End of love
यक-ब-यक == Suddenly
नामा-ए-शौक़े इश्क़ == Love Letter

Published in: on अप्रैल 1, 2009 at 9:38 पूर्वाह्न  Comments (2)  

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2 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. बहुत बढिया लिखा है … बधाई।

  2. shaandaar bhai shandaar!!!


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