यहाँ पर

जाँ देके हमने दिल को सँभाला है यहाँ पर
कुछ ऐसे उसकी याद को टाला है यहाँ पर

अब सोचते हैं मौत में ही चैन पायेंगे
कुछ मार ज़िंदगी ने यूँ ड़ाला है यहाँ पर

दम घुट रहा था मेरा अंधेरों में प्यार के
दिल में ग़मों का ही तो उजाला है यहाँ पर

मरने के इंतेज़ार में जीते हैं देखिये
कैसा ग़ज़ब ये खेल निराला है यहाँ पर

बस याद कर रहा हूँ मै जलवा-ए-यार को
बे-बादा मस्तियों को यूं पाला है यहाँ पर

ऐ नाख़ुदा तू साहिलों से दूर रख मुझे
हर शख़्स वहाँ ड़ूबने वाला है यहाँ पर

इतना नहीं था लाल ये रंगेहिना कभी
मसल किसी का दिल कहीं ड़ाला है यहाँ पर

ना चाँद ही ड़ूबा कहीं ना ही हुई है रात
‘रोहित’ तेरा ही दिल है जो काला है यहाँ पर

रोहित जैन
31-12-2008

यह ग़ज़ल Webdunia पर भी प्रकाशित हुई है

Published in: on जनवरी 28, 2009 at 7:58 अपराह्न  Comments (4)  

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4 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. अच्छी रचना है।बधाई।

  2. बहुत खूब!!

  3. I just love your poetry🙂
    Additional Info🙂 :
    You are the one who gave me the access to the amazing collection of jagjit singh through the gmail id🙂
    Life is beautiful

  4. waah bahut khoob

    majaa aagya
    har sher lajawaab hai


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