मै दिल की दीवारों से निकल आया हूँ

मै दिल की दीवारों से निकल आया हूँ
मै ग़म के नज़ारों से निकल आया हूँ

मुजरिमों कि क़तारों से निकल आया हूँ
मै ज़िंदगी के शरारों से निकल आया हूँ

आजकल फ़िक़्र करता हूँ रोटियों की मै
मै अब चाँद-तारों से निकल आया हूँ

टूटी हुई कश्ती लेकर तूफ़ानों से लड़ने को
मै समंदर के किनारों से निकल आया हूँ

अब ना दोस्त ना आशिक़ ना ही इन्सान हूँ
मै सभी किरदारों से निकल आया हूँ

ऊपर किसी के होने का वहम भी जाता रहा
मै गुंबदों से मिनारों से निकल आया हूँ

फ़क़त ये देखने को कि सेहरा क्या है
मै जन्नत की बहारों से निकल आया हूँ

आजकल कोई भी मुझे बद्दुआ नहीं देता
मै अपने लेनदारों से निकल आया हूँ

मैने ‘रोहित’ मर्ग़ में सुकूं पाया
मै साँसों के अंगारों से निकल आया हूँ

रोहित जैन
13-10-2008

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7 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. आजकल कोई भी मुझे बद्दुआ नहीं देता
    मै अपने लेनदारों से निकल आया हूँ

    मैने ‘रोहित’ मर्ग़ में सुकूं पाया
    मै साँसों के अंगारों से निकल आया हूँ

    bahut sunder bhaaw hain…..

  2. वाह!! बहुत खूब!

  3. मैने ‘रोहित’ मर्ग़ में सुकूं पाया
    मै साँसों के अंगारों से निकल आया हूँ

    हर शे’र जानदार है पर इसकी बात कुछ और!

  4. आजकल फ़िक्र करता हूँ रोटियों की मैं…वाह रोहित जी वाह…जिंदाबाद…खास तौर पर इस शेर के लिए…बहुत खूब…
    नीरज

  5. aapne bhaut achi baat likhi hai

  6. Beautful and Amazing !!!!

  7. bahut khoob rohit jee………
    majaa aagya pad kar

    आजकल फ़िक़्र करता हूँ रोटियों की मै
    मै अब चाँद-तारों से निकल आया हूँ

    aur sher ke to kya kahne

    daad kabul kare


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