यादें बिन आये भी जब

यादें बिन आये भी जब सीने में जलने लगती हैं
तस्वीरें रंग बदलती हैं तन्हाई में बोलने लगती हैं

तारीकी ऐब छुपाती है इन आँखों का उन आँखों से
पहले तो ख़्वाब पिरोती हैं फिर आँखें भीगने लगती हैं

ज़िंदा रहने की ख़्वाहिश जब इक हद तक आ जाती है तो
वो यादें हों तन्हाई हो सब पीछे छूटने लगती हैं

चाँद से ख़ौफ़ जो होता है तो आलम ऐसा होता है
वीरानों में जलती शम्में भी लौ को तोलने लगती हैं

जब ज़िम्मेदारी औरों की इस ज़हन पे ज़ाहिर होती है
दिल की ज़मीं दरकती है और राहें खुलने लगती हैं

क्या क्या दिखने लगता है फिर क्या क्या होने लगता है
इस दिल के मैख़ाने में जब वो यादें ढ़ुलने लगती हैं

ये वक़्त के हाथ में है ‘रोहित’ के मोहलत कितनी देता है
वर्ना पल दो पल की साँसें सदियों को लीलने लगती हैं

रोहित जैन
22-09-2008

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6 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. बहुत flow है ग़ज़ल में, ख़ूबसूरत।

  2. the darker side of ppl cant be perceived by everyone but who does it could be termed as rohitler

  3. बहुत उम्दा, क्या बात है!आनन्द आ गया.

  4. तारीकी ऐब छुपाती है इन आँखों का उन आँखों से
    पहले तो ख़्वाब पिरोती हैं फिर आँखें भीगने लगती हैं
    “very touching and nice to read”

    Regards

  5. ये वक़्त के हाथ में है ‘रोहित’ के मोहलत कितनी देता है
    वर्ना पल दो पल की साँसें सदियों को लीलने लगती हैं

    one more time, amazing!!!

  6. ये वक़्त के हाथ में है ‘रोहित’ के मोहलत कितनी देता है
    वर्ना पल दो पल की साँसें सदियों को लीलने लगती हैं

    one more time, amazing!!!


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