क्या क्या

कौन ये कश्ती ले उतरा तूफ़ान में
इतना दम कब से आया इन्सान में

वो देखता रह्ता है आसमां की तरफ़
कोई रहता होगा आसमान में

मेरी बातें कोई भी समझा ही नहीं
शायद होगी कोई कमी बयान में

बाकी सब कुछ तो पाया हमने यारों
खुशी नहीं मिल पाई भरे जहान में

इस्लाह करे कोई तो कोई बात बने
कैसे कैसे भरे हैं लब्ज़ ज़बान में

गुस्सा भी है और तलब तहज़ीब भी है
दो दो तलवारें हैं एक मयान में

आबोहवा के नुक़्स से हालत है ये
वरना कोई कमी नहीं इन्सान में

ले दे के अब दिल भी मान गया है ये
कुछ भी नहीं धरा है अब ईमान में

मुझको तो बातें कल की भी याद नहीं
कैसे रखते हो बरसों को ध्यान में

होश गया हवास गया छूटी तौफ़ीक़
बस मुर्दा सा जिस्म बचा सामान में

‘रोहित’ ग़म, आँसू, उम्मीदें, ख़्वाब भी कुछ
क्या क्या भर रक्खा है दिल-दुकान में

रोहित जैन
19-09-2008

Published in: on सितम्बर 19, 2008 at 6:41 अपराह्न  Comments (6)  
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6 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. गुस्सा भी है और तलब तहज़ीब भी है
    दो दो तलवारें हैं एक मयान में

    –बहुत खूब!!

  2. अच्छा लगा आपकी गज़ल पढ़ना ।

  3. कौन ये कश्ती ले उतरा तूफ़ान में
    इतना दम कब से आया इन्सान में

    वो देखता रह्ता है आसमां की तरफ़
    कोई रहता होगा आसमान में
    dil ko chu gai hai ….umda

  4. वो देखता रह्ता है आसमां की तरफ़
    कोई रहता होगा आसमान में

    this is very new thought… congrats!

  5. वो देखता रह्ता है आसमां की तरफ़
    कोई रहता होगा आसमान में

    Amazing!!

  6. खूबसूरत नज़्म है. अच्छा लगा आपको पढ़ना


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