जाता क्या है

तू क्या है ये तुझको पता है
क्या है गर दुनिया ही ख़फ़ा है

मारे दुनिया तू ना मरेगा
गर तुझको अब भी जीना है

सोच रहा है दुनिया की तू
अच्छा इसने किसको कहा है

क्या खोया है सोचूं क्यूं मैं
जो रह जाए वो अच्छा है

प्यार किया था प्यार किये जा
सोच नहीं के मिलता क्या है

मिलते हैं दुनिया में कितने
तेरे जैसा कौन हुआ है

सब ख़ुश हैं तो ख़ुश हो ‘रोहित’
ऐसा कर के जाता क्या है

रोहित जैन
05-06-2015

Published in: on अगस्त 3, 2015 at 8:04 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  

इस दिल से मजबूर रहूंगा

इस दिल से मजबूर रहूंगा
अब तुमसे कुछ दूर रहूंगा

तुम्हे बनाया है क्या मैंने
सोच के ये मग़रूर रहूंगा

बहुत देख ली रोशनी मैंने
अब कुछ दिन बेनूर रहूंगा

नहीं मिला है कुछ दुनिया से
अब ख़ुद में ही चूर रहूंगा

जब तक हूं महबूस तुम्हारा
तब तक मैं माज़ूर रहूंगा

जब तक इश्क़ का नाम है ‘रोहित’
तब तक मैं मशहूर रहूंगा

रोहित जैन
16-12-2014

Published in: on अगस्त 3, 2015 at 7:57 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  
Tags: ,

हमने तो जाम में उतारा था

हमने तो जाम में उतारा था
वो जो वादा कभी तुम्हारा था

आँख में आँख का नज़ारा था
एक ऐसा भी इस्तिआरा था

तुम जो आए हो तो भला कैसे
हमने अल्लाह को पुकारा था

हमको तन्हाइयों के सहरा में
अश्क़ के आब का सहारा था

जब तुम से नहीं लगा था दिल
वक़्त तब भी यहां गुज़ारा था

आज तक भूलता नहीं ये दिल
कोई सदक़ा कभी उतारा था

हाय शर्माए थे वो देख मुझे
हाय ज़ुल्फ़ों को भी संवारा था

तेरे वादे से ड़र क्यूं लगता है
तब तो सब कुछ मुझे गंवारा था

तुमने टुकड़े उठाये थे जिसके
हाँ मेरा दिल था, पारा पारा था

आज ‘रोहित’ को कौन समझाए
उसके दिल ने ही उसको मारा था

रोहित जैन
13-11-2014

Published in: on अगस्त 3, 2015 at 7:52 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  
Tags: , , , ,

तो बहुत रोया

जब तक चुप था चुप था, रोया तो बहुत रोया
ये दिल जो कभी पत्थर था, टूटा तो बहुत रोया

ऐसी तो नहीं किस्मत कोई हाल अपना पूछे
जब हाल खुद से खुद का, पूछा तो बहुत रोया

जिस शख़्स ने पलटकर जाते हुए न देखा
कल शाम उसने मुझको, देखा तो बहुत रोया

वो शख़्स ज़िंदगीभर जो प्यार बांटता था
जब जब किसी ने दिल को, तोड़ा तो बहुत रोया

वो था बड़ा ही अहमक़ माने था सबको अपना
कोई नहीं मिला जब, अपना तो बहुत रोया

आँखों पे मोहब्बत ने क्या रंग था चढ़ाया
उतरा जो आँख पर से, चश्मा तो बहुत रोया

खुश होके ज़माने को घज़लें सुना रहा था
जब खुद पे लिखने बैठा, नग़मा तो बहुत रोया

क्या मौज सी उठी थी, जिस में हुआ वो तर था
उतरा जो मोहब्बत का, दरिया तो बहुत रोया

जिस पेड़ को उसी ने सींचा था ख़ूं पिलाकर
साये में उसके जाके, बैठा तो बहुत रोया

यूं तो शिकस्त कितनीं खाईं थीं बेचारे ने
हाथों से अपने खुद ही, हारा तो बहुत रोया

ये ज़िंदगी की साज़िश उसको समझ न आई
‘रोहित’ था भोलाभाला, समझा तो बहुत रोया….

रोहित जैन
02-12-2014

सोच नहीं क्या तेरी ख़ता है

आज जो तुझसे दुनिया ख़फ़ा है, सोच नहीं क्या तेरी ख़ता है
मान ले सब से तू ही बुरा है, इस में ही अब तेरा भला है

ये दुनिया तुझको जो समझे, समझे समझे समझे समझे
जो तेरा दिल जान न पाए, उस दुनिया से लेना क्या है

प्यार था जिस से उसने मारा, जीते वो, तू सब कुछ हारा
मौत तेरी जो ख़ुशियां लाए, मर जा फिर तू सोचता क्या है

चाँद नहीं वो ना ही तारे, कालिख़ लाए तेरे प्यारे
अपनी आग को तू ज़िंदा रख, सबकी ख़ातिर क्यूं बुझता है

नाम तेरा उनको ना भाया, तूने था क्यूं नाम कमाया
थे वो बड़े और वो ही बड़े हैं, बन जा छोटा, तू छोटा है

तुझको लगी थी दुनिया सच्ची, तू अच्छा तो दुनिया अच्छी
पर ये दुनिया बहुत बुरी है, तेरा दिल था जो अच्छा है

प्यार किया था, प्यार किये जा, जो दे सकता है वो दिये जा
अपने दिल में झांक तू ‘रोहित’, अच्छा बन ना, क्या तू बुरा है

रोहित जैन
05-06-2015

Published in: on अगस्त 3, 2015 at 7:23 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  
Tags: , , ,

ये अपने बीच जो किस्सा बना है

ये अपने बीच जो किस्सा बना है
कोई रिश्ता भी है या बस अना है

मुझे मारा है तुमने रौंदकर यूँ
हैं उजले हाथ लेकिन पा सना है

मै झुककर लो ज़मीं तक आ गया हूँ
मगर वो है के वो अब तक तना है

मै दुश्मन तो कभी कहता नहीं था
मगर अब यार भी कहना मना है

मोहब्बत तर्क़ करना सीख् लूँगा
मगर इस वक़्त तो दिल आशना है

ख़ुदा थे तुम कभी पर अब नहीं हो
हाँ इक बुत से अभी तक सामना है

वो ही चेहरा दिखे सौ बार ‘रोहित’
ये टूटा दिल भी कैसा आईना है

रोहित जैन
29-12-2014

Published in: on जनवरी 4, 2015 at 6:41 अपराह्न  टिप्पणी करे  

उनको मैंने अपना माना

उनको मैंने अपना माना हाँ ये मैंने भूल करी
जान जलाकर मैंने अपनी आज ये भूल क़बूल करी

कोई फूल गुलाब का मिलता तो फिर कोई बात भी थी
खून बहाया मुफ़्त में हमने और ये ज़ीस्त बबूल करी

उसको पाया दुनिया पाई सोच के दाँव लगा बैठे
खुदको खोया दुनिया खोई और ज़िन्दगी धूल करी

जान लुटाई दिल भी लुटाया होश ही यार गंवा बैठे
अश्क़ बहाकर और ग़म खाकर दीवानगी वसूल करी

हद ही कर दी रोहितजी ने खुद ही खुद को भूल गए
अपने उसूलों पर जीते थे, ज़िन्दगी बेउसूल करी

रोहित जैन
28-11-2014

Published in: on जनवरी 4, 2015 at 6:31 अपराह्न  टिप्पणी करे  

लोग जीते हैं मर नहीं पाते

लोग जीते हैं मर नहीं पाते
काम इतना सा कर नहीं पाते

सोचो कितने मरे हुए हैं वो
मौत से भी जो डर नहीं पाते

प्यार दुश्मन से किया था जितना
तुमसे उतना भी कर नहीं पाते

उन गरीबों का कौन हाकिम है
जो खुदा की नजर नहीं पाते

जिस गली में तुझे गंवाया था
अब वहां से गुजर नहीं पा‍ते

अपनी बर्बादियों के किस्से में
आपका कम असर नहीं पाते

शेर में हाल-ए-दिल बयां करना
ये हुनर भी अगर नहीं पाते

दिल की वीरान राह पर ‘रोहित’
काश उजड़े शहर नहीं पाते

28/29-07-2011

This has also been published on Webdunia –

http://hindi.webdunia.com/literature-poems/%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%B8-%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A5%87-%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A5%E0%A4%BE-1110729068_1.htm

Published in: on अगस्त 11, 2011 at 8:34 पूर्वाह्न  Comments (2)  

कैसा होगा?

तुझको खो कर फिर से पाना कैसा होगा?
दिल में फिर से आग लगाना कैसा होगा?

टुकड़ा-टुकड़ा, जर्रा-जर्रा बिखरा हूं मैं
एक सिफर फिर से बन जाना कैसा होगा?

रो-रोकर ये मेरी आंखें सूख चुकी हैं
फिर से एक सैलाब का आना कैसा होगा?

कितनी सारी बातें हैं तुझसे कहने की
तुझसे मिलके चुप हो जाना कैसा होगा?

कितनी मुश्किल से दुनिया में घुल पाया था
उकता के फिर खुद में जाना कैसा होगा?

रफ्ता-रफ्ता मर-मर के तुझको भूला था
याद में तेरी फिर जी जाना कैसा होगा?

जिस पन्ने पर मैंने खुद को छोड़ दिया था
उस पन्ने का फिर खुल जाना कैसा होगा?

क्या होगा गर फिर से मैं, मैं ही बन जाऊं?
फिर से मेरा दिल दीवाना कैसा होगा?

This is also published on Webdunia.

http://hindi.webdunia.com/literature-poems/%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%9A%E0%A5%81%E0%A4%AA-%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%BE-1110729065_1.htm

Published in: on अगस्त 2, 2011 at 6:11 पूर्वाह्न  Comments (3)  

ज़िंदगी अपनी

लो कर दी पेश हमने ये मज़ाके ज़िंदगी अपनी
हँसें वो भी ज़रा खुलकर जो देखें ज़िंदगी अपनी

मसर्रत का ज़िकर करते ही मौत आती है धमकाने
उठाने यार आते हैं जनाज़े, ज़िंदगी अपनी

कभी सोचेंगे किस गलती की हमने ये सज़ा पाई
के आहें बन गईं हैं अब मिजाज़े ज़िंदगी अपनी

कभी खेले हैं हम इस से, कभी इसको उड़ाया है
जो आई नींद तो सोए बिछाके ज़िंदगी अपनी

वो क्या रिश्ते थे, मेरे यार थे माशूक़ थे क्या थे?
जिन्होने तोड़ ड़ाली है ये ख्वाबे ज़िंदगी अपनी

मेरी मजबूरियों का तुम नहीं रखते हो अंदाज़ा
नहीं पूछो कहाँ आया बिताके ज़िंदगी अपनी

जो अपनों का शहर था हाल उसका हो गया है ये
बड़ी दिक़्क़त से आए हैं बचाके ज़िंदगी अपनी

जो कहता हूँ संभल जाओ तो मानो बात मेरी तुम
सबक पाए हैं मैने आज़माके ज़िंदगी अपनी

बहुत रोया भी, तड़पा भी, ग़मों से छटपटाया भी
बड़ी नेमत मिलीं तुम पर लुटाके ज़िंदगी अपनी

करी कितनी इबादत, मन्नतें रक्खीं, दुआ मांगीं
नहीं आई मगर अब तक ठिकाने ज़िंदगी अपनी

उसे देखा तो पहचाना नहीं और आईना बोला
कहाँ रख दी है ‘रोहित’ ने चुराके ज़िंदगी अपनी

रोहित जैन
23-05-2011

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.