गुलज़ार साहब की ग़ज़ल से काफ़िया चुराने की गुस्ताखी कर रहा हूँ, उम्मीद है आप इसके लिये मुझे माफ़ करेंगे…
गलती ही की जो सब बोला खरा खरा
क्या बोलूं अब मै हूँ कितना ड़रा ड़रा
कुछ तो तबियत यारों अपनी नाज़ुक है
और जिगर का ज़ख़्म भी तो है हरा हरा
जब से तूने खाली खाली बातें कीं
तब से मेरा दिल रहता है भरा भरा
चेहरे का बिस्तर भी सिलवट सिलवट है
ज़ीस्त का दफ़्तर भी बिखरा है ज़रा ज़रा
इश्क़, रफ़ाक़त, रिश्ते, पैसा, जागीरें
सब रह जाएगा ऐसे ही धरा धरा
ऐसा क्या बोला ‘रोहित’ इस दुनिया से
जो इन की नज़रों में तू है मरा मरा
रोहित जैन
31-08-2010
क्या बात है !
आनंद आ गया
बहुत खूब।
आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
वाह! बहुत बढ़िया लगा!
bhaiya Gulzar saab ke alaawaa Rahat indori se bhi maafi maangiye
अरे नहीं रोहित जी! कुछ भी बोलिए (मरा मरा नहीं) अमर रहेंगे आप तो कलम के माध्यम से।
ऐसा क्या बोला ‘रोहित’ इस दुनिया से
जो इन की नज़रों में तू है मरा मरा
बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल लगी रोहित जी।