गलती ही थी अदाकारी नहीं की
तभी तो किसी से भी यारी नहीं की
ख़फ़ा मुझसे होने लगा है ज़माना
उसूलों से मैने गद्दारी नहीं की
बिकता अगर मै तो मौके बहुत थे
ज़मीर की फ़ितरत बाज़ारी नहीं की
गलत बात थी इसलिये लड़ पड़ा था
ख़ता कोई ऐसी तो भारी नहीं की
अकेला ही था मै जहां के मुक़ाबिल
किसी ने मेरी ग़मगुसारी नहीं की
वही बात बोली जो रखी ज़हन में
सच-ओ-झूठ की पर्दादारी नहीं की
मुझे मुफ़लिसी का लगा शौक़ ऐसा
अमीरों की महफ़िलशुमारी नहीं की
ख़ुदा ने बनाया है ऐसा ही मुझको
वहशत की उम्मीदवारी नहीं की
ग़ज़ल में तो बस हालेदिल ही लिखा है
‘रोहित’ ने कोई फ़नकारी नहीं की
रोहित जैन
22-6-2010
बड़ी सीधी साधी सच्ची बात रख दी आपने इस कविता के माध्यम से।
bahut acche hai….kitne seedhe aur sacche sabdo mein baat kahi gayee hai….