शोला-ए-इश्क़ को बुझाना चाहिये था
यूँ नहीं ख़ुद को जलाना चाहिये था
मेरी गुमराहियों पर एतराज़ करता था
राह पर मुझको तो लाना चाहिये था
ये कहता है के कुछ नहीं ताबीर मेरी
ख़्वाब तो कोई दिखाना चाहिये था
मेरे दिल था शुबा के अक्स किसका है
नाम तो लेकिन बताना चाहिये था
आज तू कहता है इश्क़ दौलत है
यूँ नहीं मुझको गंवाना चाहिये था
वो भी तन्हा था भरे ज़माने में
मेरे भी दिल को ठिकाना चाहिये था
उन्हे जो साहिलों पे बैठ के भी रोते हैं
तूफ़ान में ही ड़ूब जाना चाहिये था
कब कहा ‘रोहित’ ने क़ायनात मिले
तेरे दिल में आशियाना चाहिये था
रोहित जैन
20-07-2010
कब कहा ‘रोहित’ ने क़ायनात मिले
तेरे दिल में आशियाना चाहिये था
वाह , अच्छा प्रयास है । जारी रखें ।