मेरे वजूद को यूँ तेरे काम आना है
जिगर का लख़्त लख़्त होंठ पर सजाना है
न जाने क्या कहा है शम्अ ने परवाने से
के अब उसे तो जल के ख़ाक ही हो जाना है
जो तूने कह दिया तो तर्क़ेमोहब्ब्त कर ली
जज़ा में अब भले ही हमको दिल जलाना है
तलाशेयार ने मुझको किया कहाँ से कहाँ
चले थे सोच के कि ज़िंदगी को पाना है
मुझे भी होने लगी अब तो चाह जन्नत की
मुझे भी ये फ़रेब आसमाँ का खाना है
मुझे तो प्यार है उदूं के इरादों से भी अब
तेरी उल्फ़त में भला लग रहा ज़माना है
मेरा चिराग़ तो कब का ये बुझ गया था मगर
तेरी निस्बत में इसे राह पर सजाना है
बुला रहे हैं मुझे मैक़दा भी मस्जिद भी
कहीं भी जाऊँ वहाँ तेरा अक्स पाना है
उफ़क़ से संगेआफ़ताब ज्यों ही आयेगा
हर एक रात को टुकड़ों में बिखर जाना है
जो वक़्त यूँ तो रेंगता है मेरी साँसों में
जो तेरा साथ हो तो पल में गुज़र जाना है
न जाने कब ये कटे पाप, हो सेहर ‘रोहित’
तुझे भी यूँ ही तब तलक तो जिये जाना है
रोहित जैन
17-12-2008
रोहित साहन सब आप की दुआ है! ज़िन्दगी ग़ुज़र रही है! आपकी रचनाएँ पढ़ता हूँ तो सुकून आता है वरना तो यहाँ सब चार ग़ज़ल सुन-पढ़के पोस्टमर्टम पेश करते हैं! सच बड़ा दुखता है दिल!
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चाँद, बादल और शाम
न जाने कब ये कटे पाप, हो सेहर ‘रोहित’
तुझे भी यूँ ही तब तलक तो जिये जाना है
wah wah wah