यही मंज़र यहाँ पे ताहद-ए-नज़र होंगे

यही मंज़र यहाँ पे ताहद-ए-नज़र होंगे
टूट के बिखरे से तूफ़ान में ये घर होंगे

जो अभी उड़ रहा है देख आसमाँ में कहीं
ज़मीं पे आते ही क़तरे हुए से पर होंगे

जो जहां को पता चल जाए तू है काँच का बुत
बस उसी पल सभी के हाथ में पत्थर होंगे

तेरे एहसास की मिट्टी का है जहाँ भी महल
तू ज़रा देखना बादल वहीं पे तर होंगे

किसी सय्याद ने पकड़े हैं परिंदे सारे
बड़े ग़मसोज़-ओ-चुपचाप अब शजर होंगे

ये जो खवाबों के जज़ीरे हैं तेरी आँखों में
इन्ही के बीच में अश्क़ों के समन्दर होंगे

ये सभी फूल तमन्ना के बिखर जाएंगे
किसी मज़लूम के जैसे ये दर-ब-दर होंगे

जिनकी तारीख़ ने परवाह नहीं की है कभी
उन्ही के हाथ से सँवरे हुए मंज़र होंगे

ये तो मालूम था के एक दिन फ़ना होंगे
नहीं मालूम था ग़ारत हम इस क़दर होंगे

वो इन्क़िलाब की बातें न करें बोल उन्हे
कोई सुन लेगा तो मक़्तल पे उनके सर होंगे

जिन्हे तू मान रहा है ख़ुदा यहाँ ‘रोहित’
उन्ही के नाम पर तू देखना क़हर होंगे

रोहित जैन
22-12-2008

ताहद = Till the limits

ग़मसोज़ = Immersed in sorrow

जज़ीरे = Islands

मज़लूम = Poor and helpless

ग़ारत = Destroyed

मक़्तल = Stone for cutting head

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Published in: on जनवरी 26, 2009 at 10:25 अपराह्न  टिप्पणियाँ (5s)  

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  1. बहुत बढ़िया। कठिन उर्दु शब्दों के अर्थ भी साथ दे देते तो बेहतर रहता।
    घुघूती बासूती

  2. जो जहां को पता चल जाए तू है काँच का बुत
    बस उसी पल सभी के हाथ में पत्थर होंगे

    bahut khoob saahab..
    andaaz-e-bayaan bahut badhiyaa

  3. जो जहां को पता चल जाए तू है काँच का बुत
    बस उसी पल सभी के हाथ में पत्थर होंगे

    -बहुत उम्दा ख्याल! बधाई.

  4. bahut achha rohit bhai. is baar bhi time lagaya par majaa aa gaya :)

  5. ये जो खवाबों के जज़ीरे हैं तेरी आँखों में
    इन्ही के बीच में अश्क़ों के समन्दर होंगे
    जिनकी तारीख़ ने परवाह नहीं की है कभी
    उन्ही के हाथ से सँवरे हुए मंज़र होंगे
    जिन्हे तू मान रहा है ख़ुदा यहाँ ‘रोहित’
    उन्ही के नाम पर तू देखना क़हर होंगे
    रोहित जी बहुत दिनों बाद पढ़ा आपको लेकिन आप की इस बेहतरीन ग़ज़ल को पढ़ कर सारे शिकवे शिकायतें भूल गए…बहुत उम्दा लफ्ज़ और खयालात डाले हैं आपने अपनी ग़ज़ल में आपने…बहुत बहुत बधाई… लिखते रहें क्यूँ की आपको पढ़ना बहुत सुकून पहुंचाता है…
    नीरज .


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