हमारी इब्तेदा ही है हमारी इंतेहा शायद
मुसीबत में भी अब आने लगा हमको मज़ा शायद
मोहब्बत बन गई है जान-ओ-दिल का मस’अला शायद
के हम से आशना होता है वो नाआशना शायद
जो रातों को जगे रहना हुआ है मशग़ला शायद
मोहब्बत में हुआ करता है ये ही सिलसिला शायद
य़ही इक सोच लेके हम चले जाते हैं दुनिया से
हमारा भी कोई देखा करेगा रास्ता शायद
ख़ता पर ग़ौर तक न कर सकें उनसे ग़िला कैसा
कहीं किस्मत में ही अपने लिखी थी ये सज़ा शायद
नहीं ये आँधियां मासूम हैं इनसे ना कुछ बोलो
ख़ुद हम अपने ही हाथों से बुझा बैठे दिया शायद
सितम कितने किये हैं आप ने मज़लूम आशिक़ पर
वो फिर भी कर रहा है देखिये तो मरहबा शायद
जो करते हैं सितम हमपे ख़ुदा से मूंदकर आँखें
उन्हे भी याद आयेगा किसी दिन तो ख़ुदा शायद
लो अब तुम भी लगे हो मुस्कुराने देखकर हमको
तुम्हे भी अब समझ आने लगा है माजरा शायद
वही मय्यत में ‘रोहित’ की नहीं आयेंगे के जिनको
दिया करता था वो लम्बी उमर की बद्दुआ शायद
रोहित जैन
31-10-2008
मशग़ला – Preoccupation
नहीं ये आँधियां मासूम हैं इनसे ना कुछ बोलो
ख़ुद हम अपने ही हाथों से बुझा बैठे दिया शायद
सितम कितने किये हैं आप ने मज़लूम आशिक़ पर
वो फिर भी कर रहा है देखिये तो मरहबा शायद
waah bahut hi badhiya
य़ही इक सोच लेके हम चले जाते हैं दुनिया से
हमारा भी कोई देखा करेगा रास्ता शायद
जो करते हैं सितम हमपे ख़ुदा से मूंदकर आँखें
उन्हे भी याद आयेगा किसी दिन तो ख़ुदा शायद
बहुत खूब रोहित जी…बहुत ही खूब…लाजवाब ग़ज़ल …हर शेर बेहतरीन…वाह.
नीरज
ख़ूबसूरत ग़ज़ल, रोहित!
ख़ता पर ग़ौर तक न कर सकें उनसे ग़िला कैसा
कहीं किस्मत में ही अपने लिखी थी ये सज़ा शायद
bahut sunder
bahut he badhiya