सोज़ेदिल में कभी कमी ना हो
ज़िंदगी चाहे ज़िंदगी ना हो
वो मुझे देखते हैं कुछ ऐसे
उनकी आँखों में गो नमी ना हो
राख को भी टटोलकर देखो
आग शायद अभी बुझी ना हो
पूछकर फिर से देख लो तो कहीं
तर्क़ेमोहब्बत दिल्लगी ना हो
आवाज़ वो आती नहीं खुलकर
जो कभी जानेमन दबी ना हो
मैने माना के जी लूंगा तुझ बिन
हाय पर हाल ये कभी ना हो
दुनिया कहती है वो नहीं मेरे
या ख़ुदा बात ये सही ना हो
मै नहीं मानता के उस दिल में
एहसास मेरे वास्ते कहीं ना हो
बस के ‘रोहित’ बहुत हुआ ज़ालिम
दर्द-अफ़्शां ग़ज़लकही ना हो
रोहित जैन
08-11-08
आवाज़ वो आती नहीं खुलकर
जो कभी जानेमन दबी ना हो
bahot hi umda likha hai rohit ji aapne ,bahot khub ..dhero badhai sadhuwad…….
बहुत अच्छा शब्द प्रयोग, बहुत अच्छा!