कुछ गिरा है, मै यहां पर क्या गिरा है देख लूँ
है लहू किसका ये उसका या मिरा है देख लूँ
मै नहीं जाता था बुतखाने मगर आया हूँ अब
सुन रहा हूँ के यहां चेहरा तिरा है, देख लूँ
मै चला था जिस जगह से फिर वहीं पर आ गया
किस तरह ये वक़्त का पहिया फिरा है देख लूँ
क्यों नज़र आता नहीं कुछ भी मुझे इस शहर में
किसका दिल जलता है जो कोहरा घिरा है देख लूँ
मै तो सब टूटे सिरों को घर पे आया था छुपा
फिर जो उलझा आज है वो क्या सिरा है देख लूँ
ये लहू कैसा है फैला सुर्ख़ है सारी फ़िज़ा
क्या ये दिल ‘रोहित’ का है जो के चिरा है देख लूँ
रोहित जैन
07-02-2008
कुछ गिरा है, मै यहां पर क्या गिरा है देख लूँ
है लहू किसका ये उसका या मिरा है देख लूँ
“wah, great composition”
Regards
रोहित जी बहुत बेहतरीन ग़ज़ल पढ़वाई आपने
गजल की क्लास चल रही है आप भी शिरकत कीजिये http://www.subeerin.blogspot.com
वीनस केसरी
मै नहीं जाता था बुतखाने मगर आया हूँ अब
सुन रहा हूँ के यहां चेहरा तिरा है, देख लूँ
मै तो सब टूटे सिरों को घर पे आया था छुपा
फिर जो उलझा आज है वो क्या सिरा है देख लूँ
आप की शायरी लगातार नई ऊचाईयां छू रही है…बड़ा अच्छा लग रहा है आप का यूँ तरक्की करना…अब तो तो आप के शेर उस्तादों वाले हो गए हैं…बधाई…
नीरज