बहुत दिनों से ग़ैरहाज़िर हूँ जिसके लिये माफ़ीगुज़ार हूँ. अपनी हालत बयां करने के लिये एक फ़ैज़ साहब का शेर अर्ज़ कर रहा हूँ -
दुनिया ने तेरी याद से बेग़ाना कर दिया
तुझसे भी दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के
एक नई ग़ज़ल लिखी है पेशेख़िद्मत कर रह हूँ…
नाम बदनाम है ज़माने में
हाय क्या रंग है फ़साने में
जिसको भूला वो एक पल में यहां
किया वो इश्क़ था ज़माने में
हम तो पहुँचे थे वक़्त पर लोगों
लगा उसे ही वक़्त आने में
उससे पूछो के जिस पे गुज़रा है
किस्सा आसां है जो सुनाने में
मुझको हर बार यकीं होता है
गज़ब अंदाज़ हर बहाने में
जो हमेशा से कहीं क़ायम था
लगे हैं उसको आज़्माने में
वो भटकता था इश्क़ का मारा
होश आये हैं अब ठिकाने में
जलनेवाला तो फ़ना था शायद
किसने दी है ख़बर ज़माने में
हाथ ख़ारों से भर गये मेरे
फूल इक ज़ुल्फ़ में सजाने में
सारी दुनिया ही लुट गई मेरी
उसको अपना ख़ुदा बनाने में
पनाह हसरतों में ढ़ूंढ़ते थे
लगे थे हम भी सर छुपाने में
कितना मजबूर हो गया था कभी
उसे मै हाल-ए-दिल सुनाने में
ज़ख़्म-ए-दिल से ही रोशनी है यहां
दिया यही है आशियाने में
बस यही सोचकर के मै चुप ही रहा
तेरा भी ज़िक़्र है फ़साने में
साँस हो ख़वाब हो या हो हस्ती
वक़्त लगता नहीं है जाने में
ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था वजूद
चंद टुकड़े खुशी के पाने में
वक़्त कितना लगा था बसने में
लगा था पल ही बस जलाने में
हम भी खुश हैं, नहीं है कोई भी ग़म
लगे थे हम भी ये दिखाने में
बख़्श दे ऐ ख़ुदा तू ‘रोहित’ को
और भी काम हैं ज़माने में
रोहित जैन
08-09-2008
ये केवल कुछ पंक्तियाँ ही नही हैं…..इसमे सुंदर भाव भी दिख रहे हैं ……बहुत सुंदर
बहुत आभार आपका इस प्रस्तुति के लिए.
रोहित भाई बड़े दिन बाद आये और इक-इक शे’र कमाल का लिखा! मेरा कुछ ख़ास पसंदीदा
हाथ ख़ारों से भर गये मेरे
फूल इक ज़ुल्फ़ में सजाने में!
वाह!