ना मंदिरों में पायेगा ना मस्जिदों में पायेगा
ढ़ूंढ़ना है जो ख़ुदा तो ग़मज़दों में पायेगा
जब उस ख़ुदा ने अर्श को और फ़र्श को बांटा नहीं
फिर चैन कैसे आदमी इन सरहदों में पायेगा
घर में जाके देख तो बच्चे हैं कुछ भूखे वहां
य़े बता दे फिर खुशी क्या मैकदों में पायेगा
ना ही किसी की भीख से ना रहम से रख वास्ता
जो भी तुझको चाहिये वो मक़सदों में पायेगा
ढ़ूंढ़ता जिसको है तू वो ज़ुल्फ़ के बस में नहीं
छांव तुझको चाहिये तो बरगदों में पायेगा
आसमां छूना है तो फैला के पर उड़ जा अभी
पाना है तुझको मंज़िलें तो ना हदों में पायेगा
जो यहीं बिखरा हुआ है तेरे मेरे आस पास
वो ही किताबों में वो ही तू बुतकदों में पायेगा
जो दफ़्न है अंदर उसे ना भूलना प्यारे कभी
दम हुआ जो नींव में तो गुम्बदों में पायेगा
रोहित जैन
01-10-2007
ना मंदिरों में पायेगा ना मस्जिदों में पायेगा
ढ़ूंढ़ना है जो ख़ुदा तो ग़मज़दों में पायेगा
जो दफ़्न है अंदर उसे ना भूलना प्यारे कभी
दम हुआ जो नींव में तो गुम्बदों में पायेगा
बहुत खूब रोहित जी..
***राजीव रंजन प्रसाद
excellent sir congratulations
बहुत बेहतरीन!!
kya baat hai
bahut khubsurat
kya baat hai miyaan, shabdon jaadoo chhalaka rahe ho!