ना मंदिरों में पायेगा ना मस्जिदों में पायेगा

ना मंदिरों में पायेगा ना मस्जिदों में पायेगा
ढ़ूंढ़ना है जो ख़ुदा तो ग़मज़दों में पायेगा

जब उस ख़ुदा ने अर्श को और फ़र्श को बांटा नहीं
फिर चैन कैसे आदमी इन सरहदों में पायेगा

घर में जाके देख तो बच्चे हैं कुछ भूखे वहां
य़े बता दे फिर खुशी क्या मैकदों में पायेगा

ना ही किसी की भीख से ना रहम से रख वास्ता
जो भी तुझको चाहिये वो मक़सदों में पायेगा

ढ़ूंढ़ता जिसको है तू वो ज़ुल्फ़ के बस में नहीं
छांव तुझको चाहिये तो बरगदों में पायेगा

आसमां छूना है तो फैला के पर उड़ जा अभी
पाना है तुझको मंज़िलें तो ना हदों में पायेगा

जो यहीं बिखरा हुआ है तेरे मेरे आस पास
वो ही किताबों में वो ही तू बुतकदों में पायेगा

जो दफ़्न है अंदर उसे ना भूलना प्यारे कभी
दम हुआ जो नींव में तो गुम्बदों में पायेगा

रोहित जैन
01-10-2007

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4 Comments Leave a comment.

  1. On May 1, 2008 at 3:16 pm राजीव रंजन प्रसास Said:

    ना मंदिरों में पायेगा ना मस्जिदों में पायेगा
    ढ़ूंढ़ना है जो ख़ुदा तो ग़मज़दों में पायेगा

    जो दफ़्न है अंदर उसे ना भूलना प्यारे कभी
    दम हुआ जो नींव में तो गुम्बदों में पायेगा

    बहुत खूब रोहित जी..

    ***राजीव रंजन प्रसाद

  2. On May 1, 2008 at 5:05 pm jagmohan verma Said:

    excellent sir congratulations

  3. On May 1, 2008 at 6:58 pm समीर लाल Said:

    बहुत बेहतरीन!!

  4. On May 2, 2008 at 2:07 pm shubhashishpandey Said:

    kya baat hai
    bahut khubsurat

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