हो गए इम्तिहान बहुत

देखे हैं इन्सान बहुत
सब ही हैं हैरान बहुत

ऐ ख़ुदा अब बस भी कर दे
हो गए इम्तिहान बहुत

कुछ रातें अब भूखी होंगी
आए हैं महमान बहुत

सच कहना कितना मुश्क़िल था
लगता था आसान बहुत

जाने कैसे कर गुज़रा सब
मै भी हूं हैरान बहुत

सब ग़म उनसे ही मिलते हैं
जिनसे हो पहचान बहुत

बस कहने की बातें हैं ये
के देखे हैं तूफ़ान बहुत

तुम भी कुछ ग़म दे सकते हो
अब भी बाकी है जान बहुत

‘रोहित’ थका अभी से है तू
अभी दूर है आसमान बहुत

रोहित जैन
30-04-2008

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7 Comments Leave a comment.

  1. On April 30, 2008 at 3:41 pm Ritesh Said:

    कुछ रातें अब भूखी होंगी
    आए हैं महमान बहुत

    सच कहना कितना मुश्क़िल था
    लगता था आसान बहुत

    जाने कैसे कर गुज़रा सब
    मै भी हूं हैरान बहुत

    तुम भी कुछ ग़म दे सकते हो
    अब भी बाकी है जान बहुत

    ye 4 sher bahut acche hain. Badhaai.

  2. On April 30, 2008 at 3:55 pm neeraj1950 Said:

    सच कहना कितना मुश्क़िल था
    लगता था आसान बहुत

    सब ग़म उनसे ही मिलते हैं
    जिनसे हो पहचान बहुत
    रोहित जी
    गज़ब के तेवर लिए हुए ग़ज़ल है आप की. बहुत खुशी हुई पढ़ कर. अपार संभावनाएं हैं आप के लेखन में. लिखते रहें.
    नीरज

  3. On April 30, 2008 at 6:58 pm Rukhsana Said:

    Bahut Khub Rohit

    har ek sher per daad kabul kare

  4. On April 30, 2008 at 7:33 pm shubhashishpandey Said:

    सब ग़म उनसे ही मिलते हैं
    जिनसे हो पहचान बहुत

    बस कहने की बातें हैं ये
    के देखे हैं तूफ़ान बहुत

    bahut sunder line hain
    bahut khub

  5. On April 30, 2008 at 7:40 pm समीर लाल Said:

    बहुत सुन्दर.

  6. On April 30, 2008 at 11:32 pm राज भाटिया Said:

    रोहित बहुत खुब सुरत शेर लिखे हे आप ने,वेसे तो सभी शेर एक से बढ कर एक हे लेकिन … यह खुछ खास लगा…सब ग़म उनसे ही मिलते हैं
    जिनसे हो पहचान बहुत.
    बहुत बहुत धन्यवाद

  7. On May 1, 2008 at 11:17 am kanchan Said:

    agree with Ritesh ji

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