देखे हैं इन्सान बहुत
सब ही हैं हैरान बहुत
ऐ ख़ुदा अब बस भी कर दे
हो गए इम्तिहान बहुत
कुछ रातें अब भूखी होंगी
आए हैं महमान बहुत
सच कहना कितना मुश्क़िल था
लगता था आसान बहुत
जाने कैसे कर गुज़रा सब
मै भी हूं हैरान बहुत
सब ग़म उनसे ही मिलते हैं
जिनसे हो पहचान बहुत
बस कहने की बातें हैं ये
के देखे हैं तूफ़ान बहुत
तुम भी कुछ ग़म दे सकते हो
अब भी बाकी है जान बहुत
‘रोहित’ थका अभी से है तू
अभी दूर है आसमान बहुत
रोहित जैन
30-04-2008
कुछ रातें अब भूखी होंगी
आए हैं महमान बहुत
सच कहना कितना मुश्क़िल था
लगता था आसान बहुत
जाने कैसे कर गुज़रा सब
मै भी हूं हैरान बहुत
तुम भी कुछ ग़म दे सकते हो
अब भी बाकी है जान बहुत
ye 4 sher bahut acche hain. Badhaai.
सच कहना कितना मुश्क़िल था
लगता था आसान बहुत
सब ग़म उनसे ही मिलते हैं
जिनसे हो पहचान बहुत
रोहित जी
गज़ब के तेवर लिए हुए ग़ज़ल है आप की. बहुत खुशी हुई पढ़ कर. अपार संभावनाएं हैं आप के लेखन में. लिखते रहें.
नीरज
Bahut Khub Rohit
har ek sher per daad kabul kare
सब ग़म उनसे ही मिलते हैं
जिनसे हो पहचान बहुत
बस कहने की बातें हैं ये
के देखे हैं तूफ़ान बहुत
bahut sunder line hain
bahut khub
बहुत सुन्दर.
रोहित बहुत खुब सुरत शेर लिखे हे आप ने,वेसे तो सभी शेर एक से बढ कर एक हे लेकिन … यह खुछ खास लगा…सब ग़म उनसे ही मिलते हैं
जिनसे हो पहचान बहुत.
बहुत बहुत धन्यवाद
agree with Ritesh ji