रास्तों पे सब ही पहचाने से लोग हैं
देखो करीब से तो अंजाने से लोग हैं
दिल में झांकोगे तो बस तन्हाईयां ही हैं
महफ़िल सजी है फिर भी वीराने से लोग हैं
करते हैं इश्क़ जानकर अंजाम इश्क़ का
नासमझ से लोग दीवाने से लोग हैं
जिसका वजूद ही नहीं, है उस से मोहब्बत
शम्मा नहीं है फिर भी परवाने से लोग हैं
हैं अश्क़ आह दर्द ही तन्ख्वाह इश्क़ की
छलके गिरे टूटे से पैमाने से लोग हैं
दिखता हो चाहे जो, है कुछ और मुख़्तसर
अपनी हक़ीक़तों के अफ़साने से लोग हैं
हर एक बिक रहा है ज़रूरत के भाव से
अस्ल में देखो तो चाराने से लोग हैं
टूटे हुए छूटे हुए लम्हों का जोड़ हैं
टुकड़ों में जोड़े बिखरे काशाने से लोग हैं
हर एक शय नशा है हर एक शय जुनूं
ज़िदगी साक़ी है मैख़ाने से लोग हैं
आज भी रोते हैं इक छोटी सी बात पर
बदले से ज़माने में पुराने से लोग हैं
छूते हैं आसमां और मिट्टी में पाँव हैं
महल की दीवारों में तहखाने से लोग हैं
अब आप ही समझाइये ये राज़-ए-ज़िंदगी
बाकी जहां में सब ही बचकाने से लोग हैं
रोहित जैन
02/09/2007
छूते हैं आसमां और मिट्टी में पाँव हैं
महल की दीवारों में तहखाने से लोग हैं
wah wah kya gazab k baat kahi bahut hi badhiya gazal,awesome.
रोहित जी
वाकई आप के हुनर की दाद देनी होगी. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल लिखी है आपने. लफ्ज़ और एहसास का जखीरा सा है आप के पास.
आप के ये शेर खास तौर पर बहुत पसंद आए.
आज भी रोते हैं इक छोटी सी बात पर
बदले से ज़माने में पुराने से लोग हैं
जिसका वजूद ही नहीं, है उस से मोहब्बत
शम्मा नहीं है फिर भी परवाने से लोग हैं
थोड़ा मीटर पर ध्यान दें तो आप बेहतरीन शायर की गिनती में शुमार हो जायेंगे.
इश्वर आप को हमेशा खुश रखे, इस दुआ के साथ
नीरज
आप ने मेरे ब्लॉग पर जो कमेन्ट दिया है उसका जवाब आप को इ-मेल पर देना चाहता था जो की मिली नहीं इसलिए वहीं अपने ब्लॉग पर ही दे दिया है जो इसप्रकार है:
“रोहित जी
आप से सम्पर्क का कोई माध्यम नहीं मिला इसलिए यहीं आप से कह रहा हूँ की “ग़ज़ल को अंधेरे से उजाले में लाने का शुक्रिया”
नीरज
ज़िदगी साक़ी है मैख़ाने से लोग हैं
bahut achhe.. bahut badhiya sgazhal haii
Sir i am readr of your blog nice creation sir. I also visit forum strated by u. I wanna contact you pesonally please reply at bohra.sankalp@gmail.com or give me urs id….
visit at http://www.jagjitsingh-sankalp.blogpsot.com