सुबह सुबह कुछ ख़याल आये ज़हन में तो लब्ज़ों ने ढ़ाल दिये….
ग़ज़ल लिखने की कोशिश की किंतु अधिक समय नहीं दे पाया इसलिये काफी unmetered है….. माफ़ीगुज़ार हूँ इसके लिये….
उन्हे पर कतरने का शौक़ है
यहाँ हवाओं से लड़ने का शौक़ है
रखो ये नफ़ासत अपने पास तुम
हमें तितलियां पकड़ने का शौक़ है
लोग ड़रते हैं ड़रें गिरने से यहाँ
हमें आसमां परखने का शौक़ है
लाख पहरे बिठा लो कुछ होगा नहीं
खुशबुओं को बिखरने का शौक़ है
वो लगे हैं हमको गिराने में सब
हमें तो आगे बढ़ने का शौक़ है
अंधेरों उजालों में उलझे हैं सब
हमें रंग भरने का शौक़ है
ये दिये ना बुझेंगे हवाओं से अब
हर हाल इन्हे जलने का शौक़ है
उन्हे शौक़ है महलों में बसें
हमें दिल में बसने का शौक़ है
रोहित जैन
24-04-2008
रखो ये नफ़ासत अपने पास तुम
हमें तितलियां पकड़ने का शौक़ है
लाख पहरे बिठा लो कुछ होगा नहीं
खुशबुओं को बिखरने का शौक़ है
अंधेरों उजालों में उलझे हैं सब
हमें रंग भरने का शौक़ है
ये शेर खास पसंद आये।
*** राजीव रंजन प्रसाद
bahut khub khas kar titli wala
ये दिये ना बुझेंगे हवाओं से अब
हर हाल इन्हे जलने का शौक़ है
bahut aache
लोग ड़रते हैं ड़रें गिरने से यहाँ
हमें आसमां परखने का शौक़ है
आप का ये ज़ज्बा शायरी में आप को दूर तक ले जाएगा. शौक बरकरार रखिये.
नीरज
बहुत खूब!!