शौक़ है

सुबह सुबह कुछ ख़याल आये ज़हन में तो लब्ज़ों ने ढ़ाल दिये….
ग़ज़ल लिखने की कोशिश की किंतु अधिक समय नहीं दे पाया इसलिये काफी unmetered है….. माफ़ीगुज़ार हूँ इसके लिये….

 
उन्हे पर कतरने का शौक़ है
यहाँ हवाओं से लड़ने का शौक़ है

रखो ये नफ़ासत अपने पास तुम
हमें तितलियां पकड़ने का शौक़ है

लोग ड़रते हैं ड़रें गिरने से यहाँ
हमें आसमां परखने का शौक़ है

लाख पहरे बिठा लो कुछ होगा नहीं
खुशबुओं को बिखरने का शौक़ है

वो लगे हैं हमको गिराने में सब
हमें तो आगे बढ़ने का शौक़ है

अंधेरों उजालों में उलझे हैं सब
हमें रंग भरने का शौक़ है

ये दिये ना बुझेंगे हवाओं से अब
हर हाल इन्हे जलने का शौक़ है

उन्हे शौक़ है महलों में बसें
हमें दिल में बसने का शौक़ है

 

रोहित जैन
24-04-2008

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5 Comments Leave a comment.

  1. On April 24, 2008 at 1:12 pm राजीव रंजन प्रसास Said:

    रखो ये नफ़ासत अपने पास तुम
    हमें तितलियां पकड़ने का शौक़ है

    लाख पहरे बिठा लो कुछ होगा नहीं
    खुशबुओं को बिखरने का शौक़ है

    अंधेरों उजालों में उलझे हैं सब
    हमें रंग भरने का शौक़ है

    ये शेर खास पसंद आये।

    *** राजीव रंजन प्रसाद

  2. On April 24, 2008 at 6:26 pm mehek Said:

    bahut khub khas kar titli wala

  3. On April 26, 2008 at 2:00 am kmuskan Said:

    ये दिये ना बुझेंगे हवाओं से अब
    हर हाल इन्हे जलने का शौक़ है

    bahut aache

  4. On April 29, 2008 at 3:43 pm neeraj1950 Said:

    लोग ड़रते हैं ड़रें गिरने से यहाँ
    हमें आसमां परखने का शौक़ है

    आप का ये ज़ज्बा शायरी में आप को दूर तक ले जाएगा. शौक बरकरार रखिये.
    नीरज

  5. On April 29, 2008 at 11:44 pm समीर लाल Said:

    बहुत खूब!!

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