अहलेमोहब्बत

कोई हमें भाता नहीं उस मेहरबां को छोड़कर
और कुछ मिलता नहीं उससे फ़ुगां को छोड़कर

अपनी अपनी है तमन्ना अपनी अपनी है दुआ
चुन लिया हमने उसे सारे जहां को छोड़कर

ऐसा नहीं कोई भी छत कोई भी दर हासिल नहीं
हमको जाना ही नहीं उसके मकां को छोड़कर

ये ख़लिश कैसी जगी है है ये कैसी आरज़ू 
और कुछ बाकी नहीं दिलेनातवां को छोड़कर

क्या लिखें ख़त में तुझे क्या कहें लब खोलकर
कोई ज़बां आती नहीं दिल की ज़बां को छोड़कर

है ‘रोहित’ अहलेमोहब्बत कोई शक़ इसमें नहीं
मर के जाएगा कहां इस आस्तां को छोड़कर
रोहित जैन
21-04-2008

 

फ़ुगां = Cry of Pain

दिलेनातवां = Weak Heart

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3 Comments Leave a comment.

  1. bahut sunder rohit ji

  2. क्या लिखें ख़त में तुझे क्या कहें लब खोलकर
    कोई ज़बां आती नहीं दिल की ज़बां को छोड़कर
    ” wah, very touching words”

  3. बहुत उम्दा-सभी शेर लाजबाब हैं.


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