आज तक जो भी हुआ प्रस्तावना है

आपको अब भी बहुत कुछ देखना है
आज तक जो भी हुआ प्रस्तावना है

चाँद तक जाने की राहें खोज लीं
दिल से दिल की राह किसको ढ़ूंढ़ना है

अब भी तुमको आस है क्या बात है
तुम भी पागल हो यही संभावना है

तुम शराफ़त से कराओगे ये काम
ये तो नियमों की कड़ी अवमानना है

टूट कर बिखरोगे अड़ियल ना बनो
जानते भी हो के किससे सामना है

लो नये नेताजी आते हैं यहाँ
हाथ में वादों का उनके झुनझुना है

कुछ तो सोचो कुछ विचारो यार तुम
अम्न-ए-आलम ये भी कोई कामना है

आप भी निकलें ज़रा ख़्वाबों से अब
आप का घर भी हवाओं में बना है

मै यूँ ही दहलीज़ पे बैठा हूं अब
क्या बला है ये सहर ये देखना है

 

रोहित जैन
18-04-2008

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4 Comments Leave a comment.

  1. On April 18, 2008 at 4:04 pm Atul Kumar Said:

    अब आगे मुख्य कहानी शुरू करें.

  2. On April 18, 2008 at 4:14 pm Rohit Jain Said:

    जनाब मै कुछ समझा नहीं…

  3. On April 18, 2008 at 6:29 pm hemjyotsana "Deep" Said:

    waah rohit jee majaa aagya padh kar…….
    kya khoob likha hai aapne ….

    saare sher ache lage par ye 2 to bahut hi ache lage

    अब भी तुमको आस है क्या बात है
    तुम भी पागल हो यही संभावना है

    टूट कर बिखरोगे अड़ियल ना बनो
    जानते भी हो के किससे सामना है….. daad kabul kare

  4. On April 21, 2008 at 11:57 pm VINAY PRAJAPATI NAZAR Said:

    लो नये नेताजी आते हैं यहाँ
    हाथ में वादों का उनके झुनझुना है

    bhai yah bahut baDhiya hai!

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