कोई मुग़ालता तो नहीं

देख आऊं वो गिरा खून कहीं मेरा तो नहीं
मेरी ही लाश सजी हो कहीं ऐसा तो नहीं

टूट ही जाते हैं ख़्वाब, साँस और उम्मीदें
सोचता हूं मुझे भी इनपे भरोसा तो नहीं

तबस्सुम सोचती रहती है हमेशा वो रहे
कहीं आपको भी ऐसी ही तमन्ना तो नहीं

मौसमी बर्फ़ हैं रिश्ते, ये पिघल जायेंगे
इन्ही शाखों पे आपका भी बसेरा तो नहीं

बोझ अश्कों का उठाएगी कई पुश्त ज़मीं
देखिये आप से कोई कहीं रुसवा तो नहीं

करूंगा याद मै हर बात जो बीती मुझ पर
फिर मै देखूंगा कहीं ज़ख़्म वो ताज़ा तो नहीं

उसे तो शौक है यारों के वो दिल से खेले
आपके दिल में भी ऐसा कोई जज़्बा तो नहीं

नशा कैसा भी हो इक रोज़ उतर जायेगा
‘रोहित’ तुम्हे भी कोई मुग़ालता तो नहीं
रोहित जैन
15-04-2008

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4 Comments Leave a comment.

  1. On April 15, 2008 at 4:10 pm Holy~Devil Said:

    बंधू आपकी शायरी में बहुत ही दम है .
    अपने शायरी के दिवानो में इस शख्स का भी नाम जोड़ लीजियेगा
    धन्यवाद

  2. On April 15, 2008 at 4:27 pm shubhashishpandey Said:

    उसे तो शौक है यारों के वो दिल से खेले
    आपके दिल में भी ऐसा कोई जज़्बा तो नहीं

    नशा कैसा भी हो इक रोज़ उतर जायेगा
    ‘रोहित’ तुम्हे भी कोई मुग़ालता तो नहीं

    mast , badhiya

  3. On April 15, 2008 at 8:24 pm Atul Kumar Said:

    है भाई है. मुगालते में ही तो सब जी रहे हैं.

  4. On April 16, 2008 at 6:07 am समीर लाल Said:

    बहुत उम्दा!!!

    देख आऊं वो गिरा खून कहीं मेरा तो नहीं
    मेरी ही लाश सजी हो कहीं ऐसा तो नहीं

    वाह!

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