खुशबू जैसे सब रिश्ते हैं

खुशबू जैसे सब रिश्ते हैं, जितना थामूं उड़ जाते हैं
इन रस्तों में कुछ गड़बड़ है, उसकी जानिब मुड़ जाते हैं

मान रहा हूं दिल टूटा है, दर्द का रिश्ता भी झूठा है
पर मानो मै रोक रहा हूँ, फिर भी रिश्ते जुड़ जाते हैं

आँख से है ओझल वो चेहरा, दिल पे पर बोझल वो चेहरा
कुछ घबरा के कुछ शरमा के, फिर तेरे दर मुड़ जाते हैं

पहले तो दिन ही मुश्किल थे, अब तो जीना भी मुश्किल है
कल के ग़म अब तक बाकी हैं, रोज़ नये कुछ जुड़ जाते हैं

कोई हल हो कोई दवा हो, कुछ तो कम जीने की सज़ा हो
सोच रहा हूं पंख लगाकर ‘रोहित’ दुनिया से उड़ जाते हैं

 

रोहित जैन
29-02-2008

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6 Comments Leave a comment.

  1. पहले तो दिन ही मुश्किल थे, अब तो जीना भी मुश्किल है
    कल के ग़म अब तक बाकी हैं, रोज़ नये कुछ जुड़ जाते हैं
    रोहित जी
    आप को पढ़ना हमेशा एक सुखद अनुभव रहा है. सुंदर शब्द और भाव से आप एक तिलिस्म रच देते हैं जो पढने वाले को अभिभूत कर देता है. शब्दों की ये जादूगरी हमेशा आप के साथ रहे इस दुआ के साथ
    नीरज

  2. कोई हल हो कोई दवा हो, कुछ तो कम जीने की सज़ा हो
    सोच रहा हूं पंख लगाकर ‘रोहित’ दुनिया से उड़ जाते हैं

    इतनी भी क्या जल्दी है?

  3. सुंदर अभिव्यक्ति, बधाईयाँ !

  4. कोई हल हो कोई दवा हो, कुछ तो कम जीने की सज़ा हो
    सोच रहा हूं पंख लगाकर ‘रोहित’ दुनिया से उड़ जाते हैं
    wah bahut khubsurat gazal hai,bahut badhai.

  5. काफी सुंदर लिखा है…।
    भाव थम गये मेरे…।

  6. वाह रोहित जी बहुत समय बाद आपकी एक शानदार गज़ल पढ़ने को मिली ।
    पढ़ कर आनन्द आगया ।
    दाद कबूल करें ।


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