खुशबू जैसे सब रिश्ते हैं

खुशबू जैसे सब रिश्ते हैं, जितना थामूं उड़ जाते हैं
इन रस्तों में कुछ गड़बड़ है, उसकी जानिब मुड़ जाते हैं

मान रहा हूं दिल टूटा है, दर्द का रिश्ता भी झूठा है
पर मानो मै रोक रहा हूँ, फिर भी रिश्ते जुड़ जाते हैं

आँख से है ओझल वो चेहरा, दिल पे पर बोझल वो चेहरा
कुछ घबरा के कुछ शरमा के, फिर तेरे दर मुड़ जाते हैं

पहले तो दिन ही मुश्किल थे, अब तो जीना भी मुश्किल है
कल के ग़म अब तक बाकी हैं, रोज़ नये कुछ जुड़ जाते हैं

कोई हल हो कोई दवा हो, कुछ तो कम जीने की सज़ा हो
सोच रहा हूं पंख लगाकर ‘रोहित’ दुनिया से उड़ जाते हैं

 

रोहित जैन
29-02-2008

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6 Comments Leave a comment.

  1. On April 11, 2008 at 4:22 pm neeraj1950 Said:

    पहले तो दिन ही मुश्किल थे, अब तो जीना भी मुश्किल है
    कल के ग़म अब तक बाकी हैं, रोज़ नये कुछ जुड़ जाते हैं
    रोहित जी
    आप को पढ़ना हमेशा एक सुखद अनुभव रहा है. सुंदर शब्द और भाव से आप एक तिलिस्म रच देते हैं जो पढने वाले को अभिभूत कर देता है. शब्दों की ये जादूगरी हमेशा आप के साथ रहे इस दुआ के साथ
    नीरज

  2. On April 11, 2008 at 4:33 pm Isht Deo Sankrityaayan Said:

    कोई हल हो कोई दवा हो, कुछ तो कम जीने की सज़ा हो
    सोच रहा हूं पंख लगाकर ‘रोहित’ दुनिया से उड़ जाते हैं

    इतनी भी क्या जल्दी है?

  3. On April 11, 2008 at 6:39 pm ravindra.prabhat Said:

    सुंदर अभिव्यक्ति, बधाईयाँ !

  4. On April 11, 2008 at 8:19 pm mehek Said:

    कोई हल हो कोई दवा हो, कुछ तो कम जीने की सज़ा हो
    सोच रहा हूं पंख लगाकर ‘रोहित’ दुनिया से उड़ जाते हैं
    wah bahut khubsurat gazal hai,bahut badhai.

  5. On April 11, 2008 at 10:49 pm divyabh Said:

    काफी सुंदर लिखा है…।
    भाव थम गये मेरे…।

  6. On April 12, 2008 at 4:29 am hemjyotsana "Deep" Said:

    वाह रोहित जी बहुत समय बाद आपकी एक शानदार गज़ल पढ़ने को मिली ।
    पढ़ कर आनन्द आगया ।
    दाद कबूल करें ।

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